वैदिक खगोल विज्ञान: यदि पृथ्वी रुक जाए — ब्रह्मांड का रहस्य
भूमिका — आकाश वैसा नहीं जैसा दिखता है
ब्रह्मांड में कुछ भी स्थिर नहीं है। सौरमंडल एक विशाल संगीत-सभा के समान है — प्रत्येक ग्रह अपनी लय में नाच रहा है, पृथ्वी सूर्य के चारों ओर निरंतर घूम रही है, चंद्रमा धीरे-धीरे अपनी कक्षा में चल रहा है, और दूर के तारे मौन जल रहे हैं। यह गति की भाषा में लिखा एक ब्रह्मांडीय काव्य है।
परंतु कल्पना कीजिए — यदि पृथ्वी को पूरी तरह रोक दिया जाए? न घूर्णन, न परिक्रमा। क्या आकाश वैसा ही रहेगा? क्या ग्रह-नक्षत्रों का नृत्य वैसा ही चलेगा? यह प्रश्न केवल वैज्ञानिक नहीं, गहरे दार्शनिक भी है। यह पूछता है — "वास्तविक" का अर्थ क्या है, जब हम आकाश की ओर देखते हैं।
सौरमंडल एवं पृथ्वी-चंद्र संबंध
सौरमंडल के केंद्र में सूर्य है — एक विशाल ऊर्जा-पिंड, जिसका गुरुत्व आठ ग्रहों, अनेक उपग्रहों और अनगिनत धूल-कणों को बाँधे हुए है। पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करती है लगभग ३६५ दिन ५ घंटे ४८ मिनट में — यही सौर वर्ष है। चंद्रमा, हमारा निकटतम खगोलीय साथी, पृथ्वी की परिक्रमा २७.३ दिनों में करता है, परंतु एक पूर्णिमा से अगली पूर्णिमा तक २९.५ दिन लगते हैं — यही सिनोडिक मास है।
यदि पृथ्वी स्थिर होती? — पृथ्वी-केंद्रित मॉडल
यदि पृथ्वी को स्थिर मानें, तो सूर्य, चंद्र एवं समस्त ग्रह-नक्षत्र प्रतिदिन उसके चारों ओर घूमते दिखाई देंगे। प्राचीन भारतीय खगोलविदों ने यही वर्णन किया — सूर्य सिद्धांत और आर्यभटीय में, जहाँ सूर्य प्रतिदिन पूर्व में उगता और पश्चिम में डूबता है।
आधुनिक विज्ञान कहता है — वास्तव में पृथ्वी घूम रही है। परंतु दार्शनिक दृष्टि से यह भेद बताता है कि "दृष्टि" और "वास्तविकता" सदा एक नहीं होती।
स्थिर पृथ्वी से दिखने वाला आकाश — पृथ्वी-केंद्रित मॉडल, आभासी गति एवं वक्री गति
पृथ्वी-केंद्रित मॉडल का विचार
मानव इतिहास के अधिकांश काल में सर्वाधिक प्रचलित मॉडल था पृथ्वी-केंद्रित मॉडल — पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में, और सूर्य, चंद्र, ग्रह एवं तारे उसके चारों ओर घूमते हुए।
यह विवरण क्लॉडियस टॉलेमी की अल्मागेस्ट में विस्तार से मिलता है। भारतीय ग्रंथों — सूर्य सिद्धांत तथा आर्यभटीय — में भी पृथ्वी-केंद्रित दृष्टि का समानांतर वर्णन है।
आभासी गति (Apparent Motion)
आकाश की ओर देखकर जो गति हमें दिखती है, वह आभासी गति है — वास्तविक नहीं, बल्कि पर्यवेक्षक की दृष्टि से देखी गई।
उदाहरण: चलती रेलगाड़ी में बैठकर यदि आप खेतों को देखें, तो पेड़ पीछे जाते दिखते हैं। वास्तव में पेड़ स्थिर हैं — आप आगे बढ़ रहे हैं।
वक्री गति (Retrograde Motion)
सबसे विस्मयकारी घटना है वक्री गति — जब कोई ग्रह कुछ दिनों तक उल्टी दिशा में चलता दिखता है। यह बाह्य ग्रहों — मंगल, बृहस्पति एवं शनि — में सर्वाधिक दिखता है।
पृथ्वी-केंद्रित मॉडल इसे एपीसाइकल (छोटा वृत्त) एवं डेफरेंट (बड़ा वृत्त) की धारणा से समझाता था।
उपमा: सोचिए, आप दौड़ में किसी धीमे धावक को पीछे छोड़ रहे हैं। पीछे छोड़ते समय वह पीछे जाता प्रतीत होता है — बाह्य ग्रहों की वक्री गति ठीक वैसी ही दिखती है।
स्रोत: NASA एवं ISRO के सौरमंडल चित्र।
सूर्य-केंद्रित बनाम पृथ्वी-केंद्रित — आकाश की गणना के दो मार्ग
१. मूल विचार
सूर्य-केंद्रित मॉडल: १५४३ में निकोलस कोपरनिकस ने अपनी पुस्तक De revolutionibus orbium coelestium में प्रस्ताव रखा कि सौरमंडल के केंद्र में सूर्य है, और सभी ग्रह (पृथ्वी सहित) उसकी परिक्रमा करते हैं।
पृथ्वी-केंद्रित मॉडल: प्राचीन यूनान एवं भारतीय खगोल में यह प्रचलित था। इसमें पृथ्वी को स्थिर मानकर सूर्य, चंद्र एवं ग्रहों की गति को उसके चारों ओर वर्णित किया जाता था।
२. समय एवं गति
पृथ्वी-केंद्रित मॉडल में ग्रहों की आभासी गति को समझाने के लिए एपीसाइकल एवं डेफरेंट की आवश्यकता पड़ती है।
सूर्य-केंद्रित मॉडल में ग्रहों की गति सरल दीर्घवृत्तीय कक्षाओं से समझाई जाती है, जहाँ केप्लर के तीन नियम लागू होते हैं:
- कक्षाएँ दीर्घवृत्त हैं
- समान समय में समान क्षेत्रफल तय होता है
- परिक्रमण काल का वर्ग ∝ दीर्घ अक्ष के घन का: T² ∝ R³
३. वैज्ञानिक दृष्टि से कौन सही है?
आधुनिक खगोल — ISRO एवं NASA के सभी अनुसंधान — सूर्य-केंद्रित मॉडल पर आधारित हैं। उपग्रह, अंतरिक्ष यान एवं ग्रह-मिशनों की सही गणना केवल सूर्य-केंद्रित यांत्रिकी से संभव है।
४. तुलनात्मक तालिका
| विषय | पृथ्वी-केंद्रित | सूर्य-केंद्रित |
|---|---|---|
| केंद्र | पृथ्वी | सूर्य |
| जटिलता | अधिक (एपीसाइकल आवश्यक) | कम (केप्लर के नियम पर्याप्त) |
| सटीकता | सीमित (केवल दृश्य) | उच्च (गणितीय + अवलोकन) |
| अवलोकन | प्रत्यक्ष दृश्य | दूरबीन/मॉडल आवश्यक |
| आधुनिक उपयोग | कोई नहीं | सभी अंतरिक्ष अनुसंधान |
| प्रस्तावक | टॉलेमी, सूर्य सिद्धांत | कोपरनिकस, केप्लर, गैलीलियो |
स्रोत: कोपरनिकस (१५४३) — De revolutionibus orbium coelestium; टॉलेमी — अल्मागेस्ट; ISRO एवं NASA सौरमंडल चित्र।
ग्रहों के कक्षीय काल (सूर्य-केंद्रित)
१. कक्षीय काल क्या है?
कल्पना कीजिए — आप सूर्य पर खड़े हैं। आपके चारों ओर बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति — सभी अपनी कक्षाओं में चल रहे हैं।
कक्षीय काल वह समय है जिसमें कोई ग्रह सूर्य की एक पूर्ण परिक्रमा करता है।
२. केप्लर का तृतीय नियम — सरल भाषा में
चार सौ वर्ष पूर्व योहानेस केप्लर ने कहा था — ग्रह जितना दूर, उतना ही अधिक समय उसकी परिक्रमा में।
उनका तृतीय नियम:
T² ∝ R³
- T = परिक्रमण काल (पृथ्वी वर्षों में)
- R = सूर्य से औसत दूरी (AU में)
- १ AU = पृथ्वी-सूर्य औसत दूरी ≈ १४.९६ करोड़ किमी
उदाहरण — मंगल ग्रह:
पृथ्वी → R = 1 AU, T = 1 वर्ष | मंगल → R = 1.524 AU
- R³ = 1.524³ ≈ 3.54
- पृथ्वी के मानों से सामान्यीकरण (1 AU → 1 वर्ष) करने पर: T² = 3.54 ⇒ T = √3.54 ≈ 1.88 वर्ष
अर्थात मंगल सूर्य की एक परिक्रमा में लगभग १ वर्ष ११ महीने लेता है।
३. NASA Planetary Fact Sheet — कक्षीय काल तालिका
| ग्रह | दूरी (AU) | कक्षीय काल (वर्ष) | दिन |
|---|---|---|---|
| बुध (Mercury) | 0.387 | 0.241 | 88 |
| शुक्र (Venus) | 0.723 | 0.615 | 225 |
| पृथ्वी (Earth) | 1.000 | 1.000 | 365 |
| मंगल (Mars) | 1.524 | 1.88 | 687 |
| बृहस्पति (Jupiter) | 5.203 | 11.86 | 4,332 |
| शनि (Saturn) | 9.537 | 29.46 | 10,759 |
| यूरेनस (Uranus) | 19.191 | 84.01 | 30,687 |
| नेपच्यून (Neptune) | 30.07 | 164.8 | 60,190 |
४. कक्षाओं का आकार
सभी ग्रह दीर्घवृत्तीय कक्षाओं में चलते हैं, जिनके एक नाभि पर सूर्य स्थित है।
- उपसौर (सूर्य के निकट) → ग्रह तेज़ चलता है
- अपसौर (सूर्य से दूर) → ग्रह धीमा चलता है
स्रोत: योहानेस केप्लर — Harmonices Mundi (१६१९); NASA Solar System Exploration; ISRO Space Science Data।
सिनोडिक काल — पृथ्वी से देखी गई ग्रह-गति
१. सिनोडिक काल क्या है?
कल्पना कीजिए — आप पृथ्वी पर खड़े होकर आकाश देख रहे हैं। सिनोडिक काल वह समय है जिसमें कोई ग्रह पृथ्वी एवं सूर्य के सापेक्ष पुनः उसी स्थिति में लौट आता है — जैसे एक युति (opposition) से अगली युति तक।
- सूर्य-केंद्रित काल → ग्रह सूर्य की एक परिक्रमा में जितना समय लेता है
- सिनोडिक काल → पृथ्वी से वही स्थिति पुनः दिखने का समय
२. उदाहरण — मंगल
सूर्य-केंद्रित काल (Tₘ) = 1.88 वर्ष · पृथ्वी का काल (Tₑ) = 1 वर्ष
1/S = | (1/Tₑ) − (1/Tₘ) | (बाह्य ग्रहों हेतु)
- 1/Tₑ = 1
- 1/Tₘ = 1 / 1.88 ≈ 0.532
- अंतर = 1 − 0.532 = 0.468
- S = 1 / 0.468 ≈ 2.136 वर्ष
अर्थात मंगल पृथ्वी से पुनः उसी स्थिति में दिखने में लगभग २ वर्ष ५० दिन लेता है।
३. आंतरिक ग्रहों हेतु भिन्न सूत्र
आंतरिक ग्रहों (बुध, शुक्र) में दोनों काल जोड़े जाते हैं:
1/S = (1/Tₑ) + (1/Tₘ) (आंतरिक ग्रहों हेतु)
४. सिनोडिक काल तालिका
| ग्रह | सूर्य-केंद्रित काल (वर्ष) | सिनोडिक काल (दिन) |
|---|---|---|
| बुध | 0.241 | 116 |
| शुक्र | 0.615 | 584 |
| मंगल | 1.88 | 780 |
| बृहस्पति | 11.86 | 399 |
| शनि | 29.46 | 378 |
| यूरेनस | 84.01 | 370 |
| नेपच्यून | 164.8 | 368 |
५. वैदिक ज्योतिष में उपयोग
- ग्रहों के गोचर का पूर्वानुमान निरयन स्थितियों पर निर्भर करता है।
- पंचांग में तिथि, नक्षत्र, योग, करण की गणना भू-केंद्रित स्थितियों से होती है।
- शनि लगभग २.५ वर्ष एक राशि में रहता है, इसलिए "साढ़े साती" की सटीक गणना हेतु शुद्ध निरयन स्थिति आवश्यक है।
स्रोत: ISRO, US Naval Observatory, NASA Solar System Dynamics।
♈ राशिचक्र एवं ग्रहों का गोचर
१. राशिचक्र क्या है?
राशिचक्र आकाश का एक काल्पनिक ३६०° वृत्त है, जो बारह समान भागों में विभाजित है — प्रत्येक ३०° का। प्रत्येक भाग एक राशि कहलाता है — मेष ♈ से मीन ♓ तक।
सूर्य, चंद्र एवं ग्रह इसी वृत्त के अनुदिश चलते हैं, जिसे क्रांतिवृत्त (ecliptic) कहा जाता है।
२. निरयन एवं सिनोडिक काल की तुलना
| शब्द | अर्थ | आधार | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| निरयन काल | स्थिर नक्षत्रों के सापेक्ष एक परिक्रमा का समय | नक्षत्र-पटल | मंगल: ६८७ दिन |
| सिनोडिक काल | पृथ्वी से पुनः उसी स्थिति में आने का समय | पृथ्वी + ग्रह | मंगल: ७८० दिन |
३. राशिचक्र पार करने का समय
| ग्रह | निरयन काल (दिन) | एक राशि | पूरा राशिचक्र |
|---|---|---|---|
| चंद्र 🌙 | 27.3 | ~2.25 दिन | 27.3 दिन |
| बुध ☿ | 88 | ~7.33 दिन | 88 दिन |
| शुक्र ♀ | 225 | ~18.75 दिन | 225 दिन |
| सूर्य ☀ | 365.25 | ~30.44 दिन | 365.25 दिन |
| मंगल ♂ | 687 | ~57.25 दिन | 687 दिन |
| बृहस्पति ♃ | 4333 | ~361 दिन | 12 वर्ष |
| शनि ♄ | 10759 | ~898 दिन | 29.46 वर्ष |
स्रोत: ISRO, US Naval Observatory।
★ वैदिक बनाम पाश्चात्य खगोल — दो आकाश, एक आकाश
जो पाठक पाश्चात्य ज्योतिष से आते हैं, वे प्रायः पूछते हैं — भारतीय कुंडली की राशि पाश्चात्य राशिफल से भिन्न क्यों होती है? उत्तर व्याख्यात्मक नहीं, खगोलीय है।
अयनांश — राशियों के अंतर का कारण
पृथ्वी का अक्ष एक धीमे लट्टू की भाँति डगमगाता है। लगभग २५,८०० वर्षों में वसंत विषुव का बिंदु राशिचक्र में पश्चिम की ओर खिसकता है। सायन (वसंत विषुव से बँधा, पाश्चात्य) एवं निरयन (स्थिर नक्षत्रों से बँधा, भारतीय) राशिचक्र के बीच के अंतर को अयनांश कहा जाता है।
२१वीं सदी में अयनांश लगभग २४ अंश है — जिसका अर्थ है कि अधिकांश लोगों की पाश्चात्य राशि एवं भारतीय राशि में एक पूरी राशि का अंतर होता है।
तुलना
| पक्ष | वैदिक / भारतीय खगोल | पाश्चात्य खगोल |
|---|---|---|
| राशिचक्र आधार | निरयन — नक्षत्रों से बँधा | सायन — वसंत विषुव से बँधा |
| अयनांश संशोधन | हाँ (लाहिड़ी / चित्रपक्ष) | नहीं |
| प्रमुख ग्रंथ | सूर्य सिद्धांत, आर्यभटीय, पंचसिद्धांतिका | अल्मागेस्ट, डी रेवोल्यूशनिबस, प्रिंसिपिया |
| पंचांग आधार | चंद्र-सौर — तिथि-आधारित मास | सौर — ग्रेगोरियन मास |
| उपविभाग | २७ नक्षत्र — प्रत्येक १३°२०′ | १२ राशियाँ — प्रत्येक ३०° |
| आज का उपयोग | पंचांग, मुहूर्त, ज्योतिष | अवलोकन खगोल, अंतरिक्ष विज्ञान |
किसका उपयोग करें?
दोनों सही हैं — परंतु भिन्न उद्देश्यों हेतु। सायन निर्देशांक आधुनिक खगोल एवं अंतरिक्ष-उड़ान की भाषा है। निरयन निर्देशांक भारतीय पंचांग एवं वैदिक ज्योतिष की भाषा है। जब कोई पंचांग कहता है — "१६ जुलाई को सूर्य कर्क में प्रवेश करेगा", तो वह निरयन प्रवेश का अर्थ है — वह वास्तविक क्षण जब सूर्य निरयन सीमा को पार करता है।
MyAstrology में प्रत्येक कुंडली लाहिड़ी अयनांश से निरयन रूप में बनाई जाती है, जो भारतीय कैलेंडर सुधार समिति (१९५५) एवं शास्त्रीय ज्योतिष ग्रंथों के अनुरूप है।
सूर्य वर्ष एवं चंद्र वर्ष का अंतर
१. सूर्य वर्ष (सौर वर्ष)
सौर वर्ष वह समय है जिसमें पृथ्वी सूर्य की एक पूर्ण परिक्रमा करती है, वसंत विषुव के सापेक्ष मापी गई।
- अवधि: ३६५ दिन ५ घंटे ४८ मिनट ४६ सेकंड
- दशमलव में: ३६५.२४२२ दिन
- ग्रेगोरियन कैलेंडर इसका सन्निकटन करता है।
२. चंद्र वर्ष
चंद्र वर्ष बारह पूर्ण चंद्र-चक्रों — अमावस्या से अमावस्या — का योग है।
- औसत सिनोडिक मास: २९ दिन १२ घंटे ४४ मिनट ३ सेकंड
- बारह मास: ≈ ३५४.३६ दिन
अर्थात चंद्र वर्ष सौर वर्ष से लगभग १० दिन २१ घंटे छोटा होता है।
३. अंतर एक दृष्टि में
| वर्ष का प्रकार | दिन | घंटे | मिनट | सेकंड | अंतर |
|---|---|---|---|---|---|
| सौर वर्ष | 365 | 5 | 48 | 46 | — |
| चंद्र वर्ष | 354 | 8 | 48 | 36 | ~१० दिन २१ घंटे छोटा |
४. खगोलीय कारण
- सौर वर्ष पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर कक्षा पर निर्भर है।
- चंद्र वर्ष चंद्रमा की पृथ्वी के चारों ओर कक्षा और सूर्य के सापेक्ष उसकी बदलती स्थिति पर निर्भर है।
५. अधिमास (मल मास) की भूमिका
चूँकि चंद्र वर्ष सौर वर्ष से छोटा है, हिन्दू पंचांग प्रायः ३२–३३ महीनों में एक अतिरिक्त मास जोड़ता है — अधिमास, जिसे मल मास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इससे उत्सव एवं ऋतुएँ समन्वित रहती हैं — जिस कारण दुर्गा पूजा सदा शरद ऋतु में ही होती है, भले ही ग्रेगोरियन तारीख हर वर्ष बदल जाती हो।
तिथि एवं हिन्दू उत्सव तिथियाँ
१. तिथि क्या है?
तिथि वह समय है जिसमें चंद्र एवं सूर्य के बीच का कोणीय अंतर १२° बढ़ जाता है।
- एक पूर्ण चंद्र-चक्र में ३० तिथियाँ होती हैं — १५ शुक्ल पक्ष की, १५ कृष्ण पक्ष की।
- प्रत्येक तिथि की अवधि भिन्न होती है — २३ घंटे ३७ मिनट से २५ घंटे तक।
- इसीलिए उत्सवों की ग्रेगोरियन तिथियाँ हर वर्ष बदलती हैं।
२. तिथि क्यों बदलती है
- चंद्रमा की कक्षा दीर्घवृत्तीय है, इसलिए उसकी कोणीय चाल बदलती रहती है।
- पृथ्वी की गति से सूर्य एवं चंद्र की सापेक्ष स्थिति प्रतिदिन समान दर से नहीं बदलती।
- इसीलिए दुर्गा पूजा, दीपावली, जन्माष्टमी हर वर्ष भिन्न ग्रेगोरियन तिथि पर आती हैं।
३. हिन्दू पंचांग
हिन्दू पंचांग चंद्र-सौर (Lunisolar) है — यह चंद्र की कलाओं एवं सूर्य की निरयन स्थिति दोनों का अनुसरण करता है।
तिथि का सूत्र:
तिथि संख्या = (चंद्र का देशांतर − सूर्य का देशांतर) ÷ १२°
जब यह अंतर १२°, २४°, ३६° … होता है, तब नई तिथि आरंभ होती है।
४. अधिमास कैसे जोड़ा जाता है
- एक चंद्र वर्ष ≈ ३५४ दिन
- एक सौर वर्ष ≈ ३६५ दिन
- अंतर ≈ ११ दिन — जो तीन वर्षों में ~३० दिन बन जाता है
जब किसी चंद्र मास में दो अमावस्याएँ आएँ परंतु बीच में कोई सूर्य संक्रांति न हो, तो वह मास अधिमास कहलाता है।
५. उदाहरण — २०२० का अधिमास
दृक सिद्धांत पंचांग के अनुसार २०२० में बंगाब्द १४२७ के आश्विन मास में अधिमास (मल मास) हुआ। १७ सितंबर २०२० की अमावस्या भारतीय समयानुसार प्रातः ०४:३० पर समाप्त हुई; अधिमास की पहली पूर्ण तिथि-तिथि १८ सितंबर २०२० थी।
महत्वपूर्ण नियम: चूँकि हिन्दू दिन सूर्योदय से आरंभ होता है, १७ सितंबर के सूर्योदय पर चल रही अमावस्या पूर्व मास की है। नए चंद्र मास का पहला सूर्योदय १८ सितंबर को पड़ता है — यही अधिमास का प्रथम दिन है।
अधिमास में विवाह, गृह-प्रवेश एवं नए व्यापार का आरंभ परंपरागत रूप से वर्जित है। परंतु इस मास में किया गया दान, जप, ध्यान एवं व्रत अक्षय पुण्य देता है — इसीलिए अधिमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।
★ हिन्दू पंचांग कैसे पढ़ें — नए पाठक हेतु मार्गदर्शिका
यदि आप हिन्दू पंचांग से परिचित नहीं हैं, तो मुद्रित पंचांग देखकर भ्रम हो सकता है। वस्तुतः यह पाँच स्तंभों वाला सुव्यवस्थित पृष्ठ है — प्रत्येक स्तंभ दिन के एक प्रश्न का उत्तर देता है।
पंचांग के पाँच अंग
- तिथि — चंद्र दिवस। एक मास में ३०। उत्सव एवं व्रत निर्धारित करती है।
- वार — सप्ताह का दिन। प्रत्येक ग्रह द्वारा शासित: रविवार (सूर्य), सोमवार (चंद्र), मंगलवार (मंगल), बुधवार (बुध), गुरुवार (बृहस्पति), शुक्रवार (शुक्र), शनिवार (शनि)।
- नक्षत्र — चंद्र का नक्षत्र — २७ विभागों में से एक, प्रत्येक १३°२०′। मुहूर्त, नामकरण एवं विवाह-मिलान हेतु।
- योग — सूर्य एवं चंद्र के देशांतर के २७ संयोगों में से एक। कुछ (सिद्धि, अमृत) शुभ हैं; अन्य (विष्कंभ, शूल) वर्जित।
- करण — आधी तिथि। मास में ११ प्रकार चक्रानुसार, कुछ अशुभ।
पंचांग में और क्या होता है
- सूर्योदय एवं सूर्यास्त — चयनित नगर के लिए गणना। क्षेत्रीय पंचांग अपने आधार-नगर के निर्देशांक उपयोग करते हैं। उदाहरण — कोलकाता का छपा दृक सिद्धांत पंचांग प्रेसिडेंसी कॉलेज, कोलकाता (२२.५७६४° उ., ८८.३६२२° पू.) के निर्देशांक उपयोग करता है।
- राहु काल — दिनमान के आठ भागों में से एक, राहु द्वारा शासित। नए कार्य हेतु अशुभ।
- यमगंड एवं गुलिक — इसी प्रकार के दो अन्य अशुभ दिवा-खंड।
- अभिजित मुहूर्त — मध्याह्न के आसपास लगभग ४८ मिनट की शुभ अवधि।
- अमृत, महेन्द्र, सर्वार्थ सिद्धि योग — विशेष कार्य आरंभ हेतु शुभ अवधियाँ।
नगर एवं समय-क्षेत्र पर टिप्पणी
तिथि, नक्षत्र, योग एवं करण — ये पृथ्वी के सभी स्थानों पर एक ही क्षण बदलते हैं। परंतु पर्यवेक्षक के स्थान के अनुसार किस कैलेंडर तिथि पर वे क्षण आते हैं, यह बदलता है। चूँकि हिन्दू दिन सूर्योदय से आरंभ होता है, लंदन का पर्यवेक्षक कभी-कभी कोलकाता के पर्यवेक्षक से भिन्न कैलेंडर तिथि देखेगा — भले ही दोनों एक ही तिथि पढ़ रहे हों।
हमारा पंचांग आपके चयनित नगर का सूर्योदय, सूर्यास्त एवं क्षेत्रीय समय दिखाता है — और तिथि एवं नक्षत्र आधार-नगर की परंपरागत पद्धति से देता है।
★ संस्कृत खगोलीय शब्दावली
नीचे दिए सभी शब्द वैदिक खगोलीय ग्रंथों में आते हैं। प्रत्येक के साथ संस्कृत शब्द, संक्षिप्त अर्थ एवं जहाँ उपयुक्त हो, निकटतम अंग्रेज़ी समानार्थी दिया गया है।
| संस्कृत | अर्थ | अंग्रेज़ी समानार्थी |
|---|---|---|
| ज्योतिष | प्रकाश का शास्त्र — वैदिक ज्योतिष | Vedic astrology |
| खगोल | आकाश का गोलक | Celestial sphere |
| ग्रह | जो ग्रहण करता है — ग्रह या पात | Planet / luminary |
| नक्षत्र | चंद्र-मानस — २७ भाग, प्रत्येक १३°२०′ | Lunar mansion |
| राशि | राशिचक्र का ३०° खंड | Sign |
| तिथि | चंद्र दिवस — चंद्र-सूर्य अंतर के १२° | Lunar day |
| पक्ष | मास का शुक्ल या कृष्ण अर्ध | Fortnight |
| करण | आधी तिथि | Half-tithi |
| योग | सूर्य + चंद्र देशांतर संयोग | Lunar-solar yoga |
| वार | सप्ताह का दिन | Weekday |
| मास | महीना | Month |
| अधिमास | अतिरिक्त अंतराल मास | Intercalary month |
| पुरुषोत्तम मास | अधिमास का अन्य नाम | Adhika month |
| अयनांश | सायन एवं निरयन राशिचक्र के बीच अंतर | Ayanamsa |
| संक्रांति | सूर्य का नई निरयन राशि में प्रवेश | Solar ingress |
| मुहूर्त | शुभ समय-खंड (४८ मिनट) | Auspicious period |
| राहु काल | राहु द्वारा शासित अशुभ दिवा-खंड | Rahu period |
| गोचर | किसी ग्रह का संचरण | Transit |
| दशा | जीवन में ग्रह-काल | Planetary period |
| कुंडली | जन्म कुंडली | Natal chart |
| पंचांग | पाँच अंगों वाला कैलेंडर | Almanac |
| दृक् | दृश्य — वास्तविक दृश्यमान स्थितियों से गणना | True-position |
| दृक सिद्धांत | ग्रहों की वास्तविक दृश्य स्थिति से पंचांग-गणना | Drik Siddhanta |
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