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वैदिक खगोल विज्ञान: यदि पृथ्वी रुक जाए — ब्रह्मांड का रहस्य

✍ लेखक: डॉ. प्रद्युत आचार्य — MyAstrology, वैदिक ज्योतिषी एवं खगोल शोधकर्ता, रानाघाट

भूमिका — आकाश वैसा नहीं जैसा दिखता है

ब्रह्मांड में कुछ भी स्थिर नहीं है। सौरमंडल एक विशाल संगीत-सभा के समान है — प्रत्येक ग्रह अपनी लय में नाच रहा है, पृथ्वी सूर्य के चारों ओर निरंतर घूम रही है, चंद्रमा धीरे-धीरे अपनी कक्षा में चल रहा है, और दूर के तारे मौन जल रहे हैं। यह गति की भाषा में लिखा एक ब्रह्मांडीय काव्य है।

परंतु कल्पना कीजिए — यदि पृथ्वी को पूरी तरह रोक दिया जाए? न घूर्णन, न परिक्रमा। क्या आकाश वैसा ही रहेगा? क्या ग्रह-नक्षत्रों का नृत्य वैसा ही चलेगा? यह प्रश्न केवल वैज्ञानिक नहीं, गहरे दार्शनिक भी है। यह पूछता है — "वास्तविक" का अर्थ क्या है, जब हम आकाश की ओर देखते हैं।

सौरमंडल एवं पृथ्वी-चंद्र संबंध

सौरमंडल के केंद्र में सूर्य है — एक विशाल ऊर्जा-पिंड, जिसका गुरुत्व आठ ग्रहों, अनेक उपग्रहों और अनगिनत धूल-कणों को बाँधे हुए है। पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करती है लगभग ३६५ दिन ५ घंटे ४८ मिनट में — यही सौर वर्ष है। चंद्रमा, हमारा निकटतम खगोलीय साथी, पृथ्वी की परिक्रमा २७.३ दिनों में करता है, परंतु एक पूर्णिमा से अगली पूर्णिमा तक २९.५ दिन लगते हैं — यही सिनोडिक मास है।

यदि पृथ्वी स्थिर होती? — पृथ्वी-केंद्रित मॉडल

पृथ्वी स्थिर होने पर आकाश का दृश्य — पृथ्वी-केंद्रित मॉडल, वैदिक खगोल
पृथ्वी स्थिर होने पर आकाश का कल्पित दृश्य — पृथ्वी-केंद्रित मॉडल

यदि पृथ्वी को स्थिर मानें, तो सूर्य, चंद्र एवं समस्त ग्रह-नक्षत्र प्रतिदिन उसके चारों ओर घूमते दिखाई देंगे। प्राचीन भारतीय खगोलविदों ने यही वर्णन किया — सूर्य सिद्धांत और आर्यभटीय में, जहाँ सूर्य प्रतिदिन पूर्व में उगता और पश्चिम में डूबता है।

आधुनिक विज्ञान कहता है — वास्तव में पृथ्वी घूम रही है। परंतु दार्शनिक दृष्टि से यह भेद बताता है कि "दृष्टि" और "वास्तविकता" सदा एक नहीं होती।

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स्थिर पृथ्वी से दिखने वाला आकाश — पृथ्वी-केंद्रित मॉडल, आभासी गति एवं वक्री गति

पृथ्वी-केंद्रित मॉडल का विचार

मानव इतिहास के अधिकांश काल में सर्वाधिक प्रचलित मॉडल था पृथ्वी-केंद्रित मॉडल — पृथ्वी ब्रह्मांड के केंद्र में, और सूर्य, चंद्र, ग्रह एवं तारे उसके चारों ओर घूमते हुए।

यह विवरण क्लॉडियस टॉलेमी की अल्मागेस्ट में विस्तार से मिलता है। भारतीय ग्रंथों — सूर्य सिद्धांत तथा आर्यभटीय — में भी पृथ्वी-केंद्रित दृष्टि का समानांतर वर्णन है।

आभासी गति (Apparent Motion)

आकाश की ओर देखकर जो गति हमें दिखती है, वह आभासी गति है — वास्तविक नहीं, बल्कि पर्यवेक्षक की दृष्टि से देखी गई।

उदाहरण: चलती रेलगाड़ी में बैठकर यदि आप खेतों को देखें, तो पेड़ पीछे जाते दिखते हैं। वास्तव में पेड़ स्थिर हैं — आप आगे बढ़ रहे हैं।

वक्री गति (Retrograde Motion)

सबसे विस्मयकारी घटना है वक्री गति — जब कोई ग्रह कुछ दिनों तक उल्टी दिशा में चलता दिखता है। यह बाह्य ग्रहों — मंगल, बृहस्पति एवं शनि — में सर्वाधिक दिखता है।

पृथ्वी-केंद्रित मॉडल इसे एपीसाइकल (छोटा वृत्त) एवं डेफरेंट (बड़ा वृत्त) की धारणा से समझाता था।

उपमा: सोचिए, आप दौड़ में किसी धीमे धावक को पीछे छोड़ रहे हैं। पीछे छोड़ते समय वह पीछे जाता प्रतीत होता है — बाह्य ग्रहों की वक्री गति ठीक वैसी ही दिखती है।

एपीसाइकल एवं वक्री गति की व्याख्या — पृथ्वी-केंद्रित मॉडल
पृथ्वी-केंद्रित मॉडल में एपीसाइकल एवं वक्री गति

स्रोत: NASA एवं ISRO के सौरमंडल चित्र।

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सूर्य-केंद्रित बनाम पृथ्वी-केंद्रित — आकाश की गणना के दो मार्ग

१. मूल विचार

सूर्य-केंद्रित मॉडल: १५४३ में निकोलस कोपरनिकस ने अपनी पुस्तक De revolutionibus orbium coelestium में प्रस्ताव रखा कि सौरमंडल के केंद्र में सूर्य है, और सभी ग्रह (पृथ्वी सहित) उसकी परिक्रमा करते हैं।

पृथ्वी-केंद्रित मॉडल: प्राचीन यूनान एवं भारतीय खगोल में यह प्रचलित था। इसमें पृथ्वी को स्थिर मानकर सूर्य, चंद्र एवं ग्रहों की गति को उसके चारों ओर वर्णित किया जाता था।

२. समय एवं गति

पृथ्वी-केंद्रित मॉडल में ग्रहों की आभासी गति को समझाने के लिए एपीसाइकल एवं डेफरेंट की आवश्यकता पड़ती है।

सूर्य-केंद्रित मॉडल में ग्रहों की गति सरल दीर्घवृत्तीय कक्षाओं से समझाई जाती है, जहाँ केप्लर के तीन नियम लागू होते हैं:

३. वैज्ञानिक दृष्टि से कौन सही है?

आधुनिक खगोल — ISRO एवं NASA के सभी अनुसंधान — सूर्य-केंद्रित मॉडल पर आधारित हैं। उपग्रह, अंतरिक्ष यान एवं ग्रह-मिशनों की सही गणना केवल सूर्य-केंद्रित यांत्रिकी से संभव है।

४. तुलनात्मक तालिका

विषयपृथ्वी-केंद्रितसूर्य-केंद्रित
केंद्रपृथ्वीसूर्य
जटिलताअधिक (एपीसाइकल आवश्यक)कम (केप्लर के नियम पर्याप्त)
सटीकतासीमित (केवल दृश्य)उच्च (गणितीय + अवलोकन)
अवलोकनप्रत्यक्ष दृश्यदूरबीन/मॉडल आवश्यक
आधुनिक उपयोगकोई नहींसभी अंतरिक्ष अनुसंधान
प्रस्तावकटॉलेमी, सूर्य सिद्धांतकोपरनिकस, केप्लर, गैलीलियो
सूर्य-केंद्रित एवं पृथ्वी-केंद्रित मॉडल की तुलना — सौरमंडल की कक्षाएँ
सूर्य-केंद्रित एवं पृथ्वी-केंद्रित मॉडल की तुलना

स्रोत: कोपरनिकस (१५४३) — De revolutionibus orbium coelestium; टॉलेमी — अल्मागेस्ट; ISRO एवं NASA सौरमंडल चित्र।

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ग्रहों के कक्षीय काल (सूर्य-केंद्रित)

१. कक्षीय काल क्या है?

कल्पना कीजिए — आप सूर्य पर खड़े हैं। आपके चारों ओर बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति — सभी अपनी कक्षाओं में चल रहे हैं।

कक्षीय काल वह समय है जिसमें कोई ग्रह सूर्य की एक पूर्ण परिक्रमा करता है।

२. केप्लर का तृतीय नियम — सरल भाषा में

चार सौ वर्ष पूर्व योहानेस केप्लर ने कहा था — ग्रह जितना दूर, उतना ही अधिक समय उसकी परिक्रमा में।

उनका तृतीय नियम:

T² ∝ R³

उदाहरण — मंगल ग्रह:

पृथ्वी → R = 1 AU, T = 1 वर्ष  |  मंगल → R = 1.524 AU

  1. R³ = 1.524³ ≈ 3.54
  2. पृथ्वी के मानों से सामान्यीकरण (1 AU → 1 वर्ष) करने पर: T² = 3.54 ⇒ T = √3.54 ≈ 1.88 वर्ष

अर्थात मंगल सूर्य की एक परिक्रमा में लगभग १ वर्ष ११ महीने लेता है।

३. NASA Planetary Fact Sheet — कक्षीय काल तालिका

ग्रहदूरी (AU)कक्षीय काल (वर्ष)दिन
बुध (Mercury)0.3870.24188
शुक्र (Venus)0.7230.615225
पृथ्वी (Earth)1.0001.000365
मंगल (Mars)1.5241.88687
बृहस्पति (Jupiter)5.20311.864,332
शनि (Saturn)9.53729.4610,759
यूरेनस (Uranus)19.19184.0130,687
नेपच्यून (Neptune)30.07164.860,190

४. कक्षाओं का आकार

सभी ग्रह दीर्घवृत्तीय कक्षाओं में चलते हैं, जिनके एक नाभि पर सूर्य स्थित है।

दीर्घवृत्तीय कक्षा में सूर्य की स्थिति — उपसौर एवं अपसौर
दीर्घवृत्तीय कक्षा में सूर्य की स्थिति — उपसौर एवं अपसौर

स्रोत: योहानेस केप्लर — Harmonices Mundi (१६१९); NASA Solar System Exploration; ISRO Space Science Data।

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सिनोडिक काल — पृथ्वी से देखी गई ग्रह-गति

१. सिनोडिक काल क्या है?

कल्पना कीजिए — आप पृथ्वी पर खड़े होकर आकाश देख रहे हैं। सिनोडिक काल वह समय है जिसमें कोई ग्रह पृथ्वी एवं सूर्य के सापेक्ष पुनः उसी स्थिति में लौट आता है — जैसे एक युति (opposition) से अगली युति तक।

२. उदाहरण — मंगल

सूर्य-केंद्रित काल (Tₘ) = 1.88 वर्ष · पृथ्वी का काल (Tₑ) = 1 वर्ष

1/S = | (1/Tₑ) − (1/Tₘ) |   (बाह्य ग्रहों हेतु)
  1. 1/Tₑ = 1
  2. 1/Tₘ = 1 / 1.88 ≈ 0.532
  3. अंतर = 1 − 0.532 = 0.468
  4. S = 1 / 0.468 ≈ 2.136 वर्ष

अर्थात मंगल पृथ्वी से पुनः उसी स्थिति में दिखने में लगभग २ वर्ष ५० दिन लेता है।

३. आंतरिक ग्रहों हेतु भिन्न सूत्र

आंतरिक ग्रहों (बुध, शुक्र) में दोनों काल जोड़े जाते हैं:

1/S = (1/Tₑ) + (1/Tₘ)   (आंतरिक ग्रहों हेतु)

४. सिनोडिक काल तालिका

ग्रहसूर्य-केंद्रित काल (वर्ष)सिनोडिक काल (दिन)
बुध0.241116
शुक्र0.615584
मंगल1.88780
बृहस्पति11.86399
शनि29.46378
यूरेनस84.01370
नेपच्यून164.8368

५. वैदिक ज्योतिष में उपयोग

स्रोत: ISRO, US Naval Observatory, NASA Solar System Dynamics।

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♈ राशिचक्र एवं ग्रहों का गोचर

१. राशिचक्र क्या है?

राशिचक्र आकाश का एक काल्पनिक ३६०° वृत्त है, जो बारह समान भागों में विभाजित है — प्रत्येक ३०° का। प्रत्येक भाग एक राशि कहलाता है — मेष ♈ से मीन ♓ तक।

सूर्य, चंद्र एवं ग्रह इसी वृत्त के अनुदिश चलते हैं, जिसे क्रांतिवृत्त (ecliptic) कहा जाता है।

२. निरयन एवं सिनोडिक काल की तुलना

शब्दअर्थआधारउदाहरण
निरयन कालस्थिर नक्षत्रों के सापेक्ष एक परिक्रमा का समयनक्षत्र-पटलमंगल: ६८७ दिन
सिनोडिक कालपृथ्वी से पुनः उसी स्थिति में आने का समयपृथ्वी + ग्रहमंगल: ७८० दिन

३. राशिचक्र पार करने का समय

ग्रहनिरयन काल (दिन)एक राशिपूरा राशिचक्र
चंद्र 🌙27.3~2.25 दिन27.3 दिन
बुध ☿88~7.33 दिन88 दिन
शुक्र ♀225~18.75 दिन225 दिन
सूर्य ☀365.25~30.44 दिन365.25 दिन
मंगल ♂687~57.25 दिन687 दिन
बृहस्पति ♃4333~361 दिन12 वर्ष
शनि ♄10759~898 दिन29.46 वर्ष

स्रोत: ISRO, US Naval Observatory।

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★ वैदिक बनाम पाश्चात्य खगोल — दो आकाश, एक आकाश

जो पाठक पाश्चात्य ज्योतिष से आते हैं, वे प्रायः पूछते हैं — भारतीय कुंडली की राशि पाश्चात्य राशिफल से भिन्न क्यों होती है? उत्तर व्याख्यात्मक नहीं, खगोलीय है।

अयनांश — राशियों के अंतर का कारण

पृथ्वी का अक्ष एक धीमे लट्टू की भाँति डगमगाता है। लगभग २५,८०० वर्षों में वसंत विषुव का बिंदु राशिचक्र में पश्चिम की ओर खिसकता है। सायन (वसंत विषुव से बँधा, पाश्चात्य) एवं निरयन (स्थिर नक्षत्रों से बँधा, भारतीय) राशिचक्र के बीच के अंतर को अयनांश कहा जाता है।

२१वीं सदी में अयनांश लगभग २४ अंश है — जिसका अर्थ है कि अधिकांश लोगों की पाश्चात्य राशि एवं भारतीय राशि में एक पूरी राशि का अंतर होता है।

तुलना

पक्षवैदिक / भारतीय खगोलपाश्चात्य खगोल
राशिचक्र आधारनिरयन — नक्षत्रों से बँधासायन — वसंत विषुव से बँधा
अयनांश संशोधनहाँ (लाहिड़ी / चित्रपक्ष)नहीं
प्रमुख ग्रंथसूर्य सिद्धांत, आर्यभटीय, पंचसिद्धांतिकाअल्मागेस्ट, डी रेवोल्यूशनिबस, प्रिंसिपिया
पंचांग आधारचंद्र-सौर — तिथि-आधारित माससौर — ग्रेगोरियन मास
उपविभाग२७ नक्षत्र — प्रत्येक १३°२०′१२ राशियाँ — प्रत्येक ३०°
आज का उपयोगपंचांग, मुहूर्त, ज्योतिषअवलोकन खगोल, अंतरिक्ष विज्ञान

किसका उपयोग करें?

दोनों सही हैं — परंतु भिन्न उद्देश्यों हेतु। सायन निर्देशांक आधुनिक खगोल एवं अंतरिक्ष-उड़ान की भाषा है। निरयन निर्देशांक भारतीय पंचांग एवं वैदिक ज्योतिष की भाषा है। जब कोई पंचांग कहता है — "१६ जुलाई को सूर्य कर्क में प्रवेश करेगा", तो वह निरयन प्रवेश का अर्थ है — वह वास्तविक क्षण जब सूर्य निरयन सीमा को पार करता है।

MyAstrology में प्रत्येक कुंडली लाहिड़ी अयनांश से निरयन रूप में बनाई जाती है, जो भारतीय कैलेंडर सुधार समिति (१९५५) एवं शास्त्रीय ज्योतिष ग्रंथों के अनुरूप है।

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सूर्य वर्ष एवं चंद्र वर्ष का अंतर

१. सूर्य वर्ष (सौर वर्ष)

सौर वर्ष वह समय है जिसमें पृथ्वी सूर्य की एक पूर्ण परिक्रमा करती है, वसंत विषुव के सापेक्ष मापी गई।

  • अवधि: ३६५ दिन ५ घंटे ४८ मिनट ४६ सेकंड
  • दशमलव में: ३६५.२४२२ दिन
  • ग्रेगोरियन कैलेंडर इसका सन्निकटन करता है।

२. चंद्र वर्ष

चंद्र वर्ष बारह पूर्ण चंद्र-चक्रों — अमावस्या से अमावस्या — का योग है।

  • औसत सिनोडिक मास: २९ दिन १२ घंटे ४४ मिनट ३ सेकंड
  • बारह मास: ≈ ३५४.३६ दिन

अर्थात चंद्र वर्ष सौर वर्ष से लगभग १० दिन २१ घंटे छोटा होता है।

३. अंतर एक दृष्टि में

वर्ष का प्रकारदिनघंटेमिनटसेकंडअंतर
सौर वर्ष36554846—
चंद्र वर्ष35484836~१० दिन २१ घंटे छोटा

४. खगोलीय कारण

  • सौर वर्ष पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर कक्षा पर निर्भर है।
  • चंद्र वर्ष चंद्रमा की पृथ्वी के चारों ओर कक्षा और सूर्य के सापेक्ष उसकी बदलती स्थिति पर निर्भर है।

५. अधिमास (मल मास) की भूमिका

चूँकि चंद्र वर्ष सौर वर्ष से छोटा है, हिन्दू पंचांग प्रायः ३२–३३ महीनों में एक अतिरिक्त मास जोड़ता है — अधिमास, जिसे मल मास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। इससे उत्सव एवं ऋतुएँ समन्वित रहती हैं — जिस कारण दुर्गा पूजा सदा शरद ऋतु में ही होती है, भले ही ग्रेगोरियन तारीख हर वर्ष बदल जाती हो।

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तिथि एवं हिन्दू उत्सव तिथियाँ

१. तिथि क्या है?

तिथि वह समय है जिसमें चंद्र एवं सूर्य के बीच का कोणीय अंतर १२° बढ़ जाता है।

२. तिथि क्यों बदलती है

३. हिन्दू पंचांग

हिन्दू पंचांग चंद्र-सौर (Lunisolar) है — यह चंद्र की कलाओं एवं सूर्य की निरयन स्थिति दोनों का अनुसरण करता है।

तिथि का सूत्र:

तिथि संख्या = (चंद्र का देशांतर − सूर्य का देशांतर) ÷ १२°

जब यह अंतर १२°, २४°, ३६° … होता है, तब नई तिथि आरंभ होती है।

४. अधिमास कैसे जोड़ा जाता है

जब किसी चंद्र मास में दो अमावस्याएँ आएँ परंतु बीच में कोई सूर्य संक्रांति न हो, तो वह मास अधिमास कहलाता है।

५. उदाहरण — २०२० का अधिमास

दृक सिद्धांत पंचांग के अनुसार २०२० में बंगाब्द १४२७ के आश्विन मास में अधिमास (मल मास) हुआ। १७ सितंबर २०२० की अमावस्या भारतीय समयानुसार प्रातः ०४:३० पर समाप्त हुई; अधिमास की पहली पूर्ण तिथि-तिथि १८ सितंबर २०२० थी।

महत्वपूर्ण नियम: चूँकि हिन्दू दिन सूर्योदय से आरंभ होता है, १७ सितंबर के सूर्योदय पर चल रही अमावस्या पूर्व मास की है। नए चंद्र मास का पहला सूर्योदय १८ सितंबर को पड़ता है — यही अधिमास का प्रथम दिन है।

अधिमास में विवाह, गृह-प्रवेश एवं नए व्यापार का आरंभ परंपरागत रूप से वर्जित है। परंतु इस मास में किया गया दान, जप, ध्यान एवं व्रत अक्षय पुण्य देता है — इसीलिए अधिमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है।

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★ हिन्दू पंचांग कैसे पढ़ें — नए पाठक हेतु मार्गदर्शिका

यदि आप हिन्दू पंचांग से परिचित नहीं हैं, तो मुद्रित पंचांग देखकर भ्रम हो सकता है। वस्तुतः यह पाँच स्तंभों वाला सुव्यवस्थित पृष्ठ है — प्रत्येक स्तंभ दिन के एक प्रश्न का उत्तर देता है।

पंचांग के पाँच अंग

  1. तिथि — चंद्र दिवस। एक मास में ३०। उत्सव एवं व्रत निर्धारित करती है।
  2. वार — सप्ताह का दिन। प्रत्येक ग्रह द्वारा शासित: रविवार (सूर्य), सोमवार (चंद्र), मंगलवार (मंगल), बुधवार (बुध), गुरुवार (बृहस्पति), शुक्रवार (शुक्र), शनिवार (शनि)।
  3. नक्षत्र — चंद्र का नक्षत्र — २७ विभागों में से एक, प्रत्येक १३°२०′। मुहूर्त, नामकरण एवं विवाह-मिलान हेतु।
  4. योग — सूर्य एवं चंद्र के देशांतर के २७ संयोगों में से एक। कुछ (सिद्धि, अमृत) शुभ हैं; अन्य (विष्कंभ, शूल) वर्जित।
  5. करण — आधी तिथि। मास में ११ प्रकार चक्रानुसार, कुछ अशुभ।

पंचांग में और क्या होता है

नगर एवं समय-क्षेत्र पर टिप्पणी

तिथि, नक्षत्र, योग एवं करण — ये पृथ्वी के सभी स्थानों पर एक ही क्षण बदलते हैं। परंतु पर्यवेक्षक के स्थान के अनुसार किस कैलेंडर तिथि पर वे क्षण आते हैं, यह बदलता है। चूँकि हिन्दू दिन सूर्योदय से आरंभ होता है, लंदन का पर्यवेक्षक कभी-कभी कोलकाता के पर्यवेक्षक से भिन्न कैलेंडर तिथि देखेगा — भले ही दोनों एक ही तिथि पढ़ रहे हों।

हमारा पंचांग आपके चयनित नगर का सूर्योदय, सूर्यास्त एवं क्षेत्रीय समय दिखाता है — और तिथि एवं नक्षत्र आधार-नगर की परंपरागत पद्धति से देता है।

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★ संस्कृत खगोलीय शब्दावली

नीचे दिए सभी शब्द वैदिक खगोलीय ग्रंथों में आते हैं। प्रत्येक के साथ संस्कृत शब्द, संक्षिप्त अर्थ एवं जहाँ उपयुक्त हो, निकटतम अंग्रेज़ी समानार्थी दिया गया है।

संस्कृतअर्थअंग्रेज़ी समानार्थी
ज्योतिषप्रकाश का शास्त्र — वैदिक ज्योतिषVedic astrology
खगोलआकाश का गोलकCelestial sphere
ग्रहजो ग्रहण करता है — ग्रह या पातPlanet / luminary
नक्षत्रचंद्र-मानस — २७ भाग, प्रत्येक १३°२०′Lunar mansion
राशिराशिचक्र का ३०° खंडSign
तिथिचंद्र दिवस — चंद्र-सूर्य अंतर के १२°Lunar day
पक्षमास का शुक्ल या कृष्ण अर्धFortnight
करणआधी तिथिHalf-tithi
योगसूर्य + चंद्र देशांतर संयोगLunar-solar yoga
वारसप्ताह का दिनWeekday
मासमहीनाMonth
अधिमासअतिरिक्त अंतराल मासIntercalary month
पुरुषोत्तम मासअधिमास का अन्य नामAdhika month
अयनांशसायन एवं निरयन राशिचक्र के बीच अंतरAyanamsa
संक्रांतिसूर्य का नई निरयन राशि में प्रवेशSolar ingress
मुहूर्तशुभ समय-खंड (४८ मिनट)Auspicious period
राहु कालराहु द्वारा शासित अशुभ दिवा-खंडRahu period
गोचरकिसी ग्रह का संचरणTransit
दशाजीवन में ग्रह-कालPlanetary period
कुंडलीजन्म कुंडलीNatal chart
पंचांगपाँच अंगों वाला कैलेंडरAlmanac
दृक्दृश्य — वास्तविक दृश्यमान स्थितियों से गणनाTrue-position
दृक सिद्धांतग्रहों की वास्तविक दृश्य स्थिति से पंचांग-गणनाDrik Siddhanta
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सूचना: ज्योतिषशास्त्र एक परंपरागत ज्ञान पद्धति है। इस पृष्ठ की सामग्री शैक्षिक उद्देश्य से दी गई है। चिकित्सा, कानून या वित्तीय निर्णयों हेतु योग्य पेशेवर से परामर्श लें।
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