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पंचांग के पन्नों पर तिथि, वार, नक्षत्र के साथ-साथ एक और महत्वपूर्ण अंग होता है — करण। अनेक लोग इसे शायद आँखों के सामने से गुज़र जाने वाला एक शब्द मानकर विशेष ध्यान नहीं देते। परंतु ज्योतिष दर्शन में करण का महत्व अपार है। क्योंकि करण समय का सूक्ष्मतम माप है — एक तिथि का अर्धांश। वराहमिहिर की बृहत्संहिता प्रत्येक करण के लिए अलग कार्य बताती है। जैसे — 'बव' करण में शुभ तथा स्थायी कार्य, 'वणिज' करण में व्यापार, और 'विष्टि' अथवा भद्रा में कोई शुभकर्म नहीं।
आज हम जानेंगे करण वास्तव में क्या है, इसकी गणना कैसे होती है, ११ करणों का शास्त्रीय वर्गीकरण तथा स्वभाव, और ज्योतिषशास्त्र में करण का महत्व — सब कुछ सरल हिंदी में, ज्योतिष दर्शन की भाषा में।
करण क्या है? ज्योतिष दर्शन की परिभाषा
करण तिथि का अर्धांश है। एक तिथि के समयकाल को दो भागों में बाँटने पर प्रत्येक भाग को करण कहा जाता है। अर्थात् 30 तिथियों में कुल 60 करण होते हैं। परंतु ये 60 करण केवल 11 नामों से जाने जाते हैं। क्योंकि कुछ करण पुनरावृत्त होते हैं, और कुछ करण निर्दिष्ट तिथियों में ही आते हैं।तिथि के अर्धांश को करण कहा जाता है, और यह कर्म के सूक्ष्म निर्णय के लिए प्रयुक्त होता है।
सांख्य दर्शन के अनुसार करण आकाशतत्त्व का प्रतिनिधि है। आकाश की भाँति करण सूक्ष्म, सर्वव्यापी तथा प्रभाव-गहन है। यह समय के उस भाग को दर्शाता है जो सामान्य दृष्टि से पकड़ में नहीं आता, परंतु कर्म के फल-निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।११ करणों का शास्त्रीय वर्गीकरण
कुल 11 करण हैं। इन्हें शास्त्र में दो भागों में विभाजित किया गया है — चर करण (चलायमान) तथा स्थिर करण (अचल)। यह वर्गीकरण करणों की पुनरावृत्ति-प्रकृति को दर्शाता है।
चर करण (7)
ये करण नियमित रूप से करण-चक्र में आवर्तित होते हैं। प्रत्येक करण एक बार आता है, तत्पश्चात् चक्र पुनः आरंभ हो जाता है। चर करण हैं —
प्रत्येक करण के अधिपति देवता तथा उपयोगी कार्य यहाँ वराहमिहिर की बृहत्संहिता के 99वें अध्याय (तिथि तथा करण) से लिए गए हैं —
| क्रम | करण का नाम | अधिपति देवता | उपयोगी कार्य (बृहत्संहिता 99) |
|---|---|---|---|
| १ | बव | इंद्र | शुभ कार्य — चर तथा स्थिर दोनों प्रकार के — और स्वास्थ्य एवं पुष्टि के कार्य |
| २ | बालव | ब्रह्मा | दान तथा ब्राह्मणों के हितकारी कार्य |
| ३ | कौलव (कुलव) | मित्र | आनंद के कार्य तथा मैत्री-स्थापन |
| ४ | तैतिल (तैतुल) | अर्यमा | जनसाधारण के प्रिय कार्य, गृह-निर्माण |
| ५ | गर (गरज) | भू (पृथ्वी) | खेती, बीज बोना, गृह-निर्माण |
| ६ | वणिज | श्री | स्थायी कार्य तथा व्यापार-वाणिज्य |
| ७ | विष्टि (भद्रा) | यम | शुभकर्म वर्जित — केवल शत्रुदमन तथा विष-संबंधी कार्यों का उल्लेख है |
चर करणों का चक्र: बव → बालव → कौलव → तैतिल → गर → वणिज → विष्टि → पुनः बव — इस क्रम में चर करण आवर्तित होते हैं।
स्थिर करण (4)
ये करण निर्दिष्ट तिथियों में आते हैं। ये करण-चक्र का अंग नहीं हैं, बल्कि विशेष तिथियों में स्थिर रूप से स्थित रहते हैं।
| करण का नाम | किस अर्धतिथि में | अधिपति देवता | उपयोगी कार्य (बृहत्संहिता 99) |
|---|---|---|---|
| शकुनि | कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के द्वितीयार्ध में | कलि | स्वास्थ्य तथा पुष्टि के कार्य, औषध-सेवन, मंत्र-शिक्षण तथा जप |
| चतुष्पाद (चतुष्पद) | अमावस्या के प्रथमार्ध में | वृष | गो, ब्राह्मण, पितृपुरुष तथा राजा से जुड़े कार्य |
| नाग | अमावस्या के द्वितीयार्ध में | सर्प | स्थिर तथा कठोर प्रकृति के कार्य — शुभकर्म के लिए नहीं |
| किंस्तुघ्न (किम्बस्तुघ्न) | शुक्लपक्ष की प्रतिपदा के प्रथमार्ध में | वायु | स्वास्थ्य एवं पुष्टि के कार्य तथा शुभकार्य |
करण गणना की शास्त्रीय पद्धति
मूल सूत्र
सूर्य सिद्धांत (स्पष्टाधिकार) तथा बृहत्संहिता (अध्याय 99) करण का क्रम देते हैं — कृष्ण चतुर्दशी के द्वितीयार्ध से चार स्थिर करण, तत्पश्चात् सात चर करण मास में आठ बार। आधुनिक भाषा में सूत्र है —अर्धतिथि-संख्या = ⌊(चंद्र का देशांतर − सूर्य का देशांतर) ÷ ६°⌋ (० से ५९)
यहाँ ⌊ ⌋ चिह्न फ्लोर फंक्शन को दर्शाता है — भागफल का केवल पूर्णांक भाग। चंद्रमा सूर्य से प्रति ६° आगे बढ़ने पर एक करण समाप्त होता है, इसलिए एक चांद्र मास में 60 करण। गणना आरंभ अमावस्या के अंत से, जब चंद्र-सूर्य की दूरी 0° — अर्थात् शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से।
चरण-दर-चरण गणना
चरण १: चंद्र तथा सूर्य का निरयण देशांतर लें। चंद्र − सूर्य करें; परिणाम ऋणात्मक होने पर 360° जोड़ें।
चरण २: इस दूरी को 6° से भाग देकर पूर्णांक भाग लें — यही अर्धतिथि-संख्या (0 से 59) है।
चरण ३: संख्या 0 होने पर किंस्तुघ्न, 57 होने पर शकुनि, 58 होने पर चतुष्पाद, 59 होने पर नाग — ये चार स्थिर करण।
चरण ४: संख्या 1 से 56 होने पर चर करण: संख्या से 1 घटाकर 7 से भाग दें। शेषफल 0 = बव, 1 = बालव, 2 = कौलव, 3 = तैतिल, 4 = गर, 5 = वणिज, 6 = विष्टि।
करण का क्रमिक तालिका (शास्त्रीय गणना के लिए)
| क्रमिक संख्या | करण का नाम | स्वभाव | मास में कहाँ आता है |
|---|---|---|---|
| १ | बव | चर | शुक्लपक्ष की प्रतिपदा के द्वितीयार्ध में प्रथम बार, तत्पश्चात् प्रति सात अर्धतिथि पर |
| २ | बालव | चर | बव के बाद वाली अर्धतिथि |
| ३ | कौलव | चर | बालव के बाद वाली अर्धतिथि |
| ४ | तैतिल | चर | कौलव के बाद वाली अर्धतिथि |
| ५ | गर | चर | तैतिल के बाद वाली अर्धतिथि |
| ६ | वणिज | चर | गर के बाद वाली अर्धतिथि |
| ७ | विष्टि (भद्रा) | चर | वणिज के बाद वाली अर्धतिथि — सात चर करण मास में आठ बार घूमते हैं (56 अर्धतिथियाँ) |
| ८ | शकुनि | स्थिर | कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के द्वितीयार्ध में |
| ९ | चतुष्पाद | स्थिर | अमावस्या के प्रथमार्ध में |
| १० | नाग | स्थिर | अमावस्या के द्वितीयार्ध में |
| ११ | किंस्तुघ्न | स्थिर | शुक्लपक्ष की प्रतिपदा के प्रथमार्ध में |
उदाहरण १: शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, दूरी 3°
- 3 ÷ 6 = 0.5 → पूर्णांक भाग 0
- अर्धतिथि-संख्या 0 = किंस्तुघ्न करण (स्थिर)
उदाहरण २: शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, दूरी 9°
- 9 ÷ 6 = 1.5 → पूर्णांक भाग 1
- 1 − 1 = 0; 0 ÷ 7 का शेषफल 0 = बव करण
उदाहरण ३: कृष्णपक्ष की द्वितीया, दूरी 198°
- 198 ÷ 6 = 33 → अर्धतिथि-संख्या 33
- 33 − 1 = 32; 32 ÷ 7 का शेषफल 4 = गर करण — कृष्ण द्वितीया के द्वितीयार्ध का (नीचे की सारणी से मिलाकर देखें)
तिथि अनुसार करण का सारणी
नीचे तिथि अनुसार करण की सम्पूर्ण सूची दी गई है —
शुक्लपक्ष के करण
| तिथि | प्रथमार्ध का करण | द्वितीयार्ध का करण |
|---|---|---|
| प्रतिपदा (1) | किंस्तुघ्न (स्थिर) | बव |
| द्वितीया (2) | बालव | कौलव |
| तृतीया (3) | तैतिल | गर |
| चतुर्थी (4) | वणिज | विष्टि |
| पंचमी (5) | बव | बालव |
| षष्ठी (6) | कौलव | तैतिल |
| सप्तमी (7) | गर | वणिज |
| अष्टमी (8) | विष्टि | बव |
| नवमी (9) | बालव | कौलव |
| दशमी (10) | तैतिल | गर |
| एकादशी (11) | वणिज | विष्टि |
| द्वादशी (12) | बव | बालव |
| त्रयोदशी (13) | कौलव | तैतिल |
| चतुर्दशी (14) | गर | वणिज |
| पूर्णिमा (15) | विष्टि | बव |
कृष्णपक्ष के करण
| तिथि | प्रथमार्ध का करण | द्वितीयार्ध का करण |
|---|---|---|
| प्रतिपदा (16) | बालव | कौलव |
| द्वितीया (17) | तैतिल | गर |
| तृतीया (18) | वणिज | विष्टि |
| चतुर्थी (19) | बव | बालव |
| पंचमी (20) | कौलव | तैतिल |
| षष्ठी (21) | गर | वणिज |
| सप्तमी (22) | विष्टि | बव |
| अष्टमी (23) | बालव | कौलव |
| नवमी (24) | तैतिल | गर |
| दशमी (25) | वणिज | विष्टि |
| एकादशी (26) | बव | बालव |
| द्वादशी (27) | कौलव | तैतिल |
| त्रयोदशी (28) | गर | वणिज |
| चतुर्दशी (29) | विष्टि | शकुनि (स्थिर) |
| अमावस्या (30) | चतुष्पाद (स्थिर) | नाग (स्थिर) |
करण का व्यावहारिक प्रयोग
१. शुभकर्म में करण की भूमिका
मुहूर्त विचार में करण देखा जाता है तिथि, नक्षत्र, योग तथा लग्न के साथ मिलाकर — अकेले करण से शुभ समय निर्धारित नहीं होता। बृहत्संहिता (99/3) कहती है, जिस देवता के नक्षत्र में कोई कार्य करने का विधान है, उस देवता की तिथि तथा करण में भी वह किया जा सकता है।
सामान्य शुभकर्मों में प्रमुख नियम एक ही है — विष्टि (भद्रा) का वर्जन। हमारा पंचांग विष्टि के साथ शकुनि, चतुष्पाद तथा नाग को भी सामान्य शुभकर्मों के समय से बाहर रखता है; इन तीन स्थिर करणों के लिए बृहत्संहिता केवल कुछ निर्दिष्ट कार्यों का उल्लेख करती है (ऊपर की सारणी देखें)।
२. विष्टि करण (भद्रा)
विष्टि करण ही भद्रा है। मुहूर्त चिंतामणि (शुभाशुभ प्रकरण) भद्रा को समस्त शुभकर्मों में वर्जनीय कहता है, और किस तिथि के किस अर्धांश में भद्रा पड़ती है — यह भी बताता है, जो ऊपर की गणना से हूबहू मेल खाती है:- शुक्लपक्ष: चतुर्थी तथा एकादशी के द्वितीयार्ध में; अष्टमी तथा पूर्णिमा के प्रथमार्ध में
- कृष्णपक्ष: तृतीया तथा दशमी के द्वितीयार्ध में; सप्तमी तथा चतुर्दशी के प्रथमार्ध में
अर्थात् चांद्र मास में आठ बार, प्रत्येक बार लगभग आधा दिन।
📖 महत्वपूर्ण अंश: मुहूर्त चिंतामणि के टीकाकारों के अनुसार भद्रा के अंतिम तीन घटी (लगभग 72 मिनट — 'भद्रा की पूँछ') दोषमुक्त हैं। नियम कार्य आरंभ करने के समय के लिए है — पहले से चल रहे कार्यों पर लागू नहीं होता।
३. स्थिर करण
चारों स्थिर करण मास में एक बार ही आते हैं, अमावस्या के दोनों ओर। बृहत्संहिता इनमें से प्रत्येक के लिए अलग कार्य बताती है (ऊपर की सारणी) — किंस्तुघ्न में शुभकार्य चलते हैं, नाग में नहीं।
करण का दार्शनिक दृष्टिकोण
पंचांग के पाँच अंगों को पंचभूत से मिलाने वाले आधुनिक लेखकों की व्याख्या — लेखकभेद से करण को कोई आकाश, कोई पृथ्वीतत्त्व से मिलाता है। परंतु करण का प्रभाव जो सूक्ष्म है, उसमें द्विमत नहीं है। यह समय के उस भाग को दर्शाता है जो सामान्य दृष्टि से पकड़ में नहीं आता, परंतु कर्म के फल-निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
करण सूक्ष्म समय का मापक है, जो कर्म की सिद्धि प्रदान करने की प्रवृत्ति उत्पन्न करता है।
करण गणना के लिए आवश्यक सूचना
करण गणना के लिए निम्नलिखित सूचना आवश्यक है —
१. तिथि-सूचना प्रथम तिथि-संख्या तथा तिथि की अग्रगति-डिग्री जाननी होगी।
२. चंद्र एवं सूर्य का देशांतर तिथि गणना के लिए चंद्र एवं सूर्य का देशांतर आवश्यक है। यह सूचना प्राप्त होती है —
- सूर्य सिद्धांत जैसे गणित-ग्रंथ से
- आधुनिक ज्योतिष सॉफ्टवेयर से
- विश्वसनीय पंचांग से
३. सूर्योदय का समय पंचांग दिन का करण सूर्योदय के क्षण से लिखता है, और दिन के भीतर करण बदलने पर बदलने का समय भी देता है। अतः स्थानीय सूर्योदय का समय जानना आवश्यक है।
उपसंहार: करण — समय का सूक्ष्मतम माप
करण गणना की पद्धति केवल एक ज्योतिर्वैज्ञानिक गणना नहीं है। यह प्राचीन भारतीय ज्योतिष दर्शन का एक अपूर्व दृष्टांत है — जहाँ समय को इतना सूक्ष्म रूप से विभाजित किया गया है कि कर्म की फलप्रवणता के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। बव में शुभ तथा स्थायी कार्य, वणिज में व्यापार, विष्टि में शुभकर्म का वर्जन — बृहत्संहिता तथा मुहूर्त चिंतामणि का यह नियम आज भी पंचांग के मुहूर्त-विचार में प्रयुक्त होता है।
"करण जानो तो समय का सूक्ष्म दान जानो,
बव-बालव में शक्ति का आभास, नाग-विष्टि में करो सावधानी।।"
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न १: विष्टि करण अथवा भद्रा को क्यों टाला जाता है? क्या यह सदैव अशुभ है?
उत्तर: मुहूर्त चिंतामणि भद्रा (विष्टि करण) को समस्त शुभकर्मों में वर्जनीय कहता है, और बृहत्संहिता भी कहती है विष्टि में शुभकार्य नहीं। परंतु टीकाकारों के अनुसार भद्रा के अंतिम तीन घटी ('पूँछ', लगभग 72 मिनट) दोषमुक्त हैं। नियम नवकार्य आरंभ करने के लिए है — पहले से चल रहे कार्यों पर लागू नहीं होता।
प्रश्न २: बव करण में कौन-से कार्य किए जा सकते हैं?
उत्तर: बृहत्संहिता (अध्याय 99) के अनुसार बव करण में शुभ कार्य — चर तथा स्थिर दोनों प्रकार के — तथा स्वास्थ्य एवं पुष्टि के कार्य किए जा सकते हैं। शत्रुदमन जैसे कार्यों का उल्लेख विष्टि करण में है, बव में नहीं। परंतु शुभ समय तिथि, नक्षत्र, योग तथा लग्न मिलाकर तय होता है, अकेले करण से नहीं।
प्रश्न ३: नाग करण में विवाह किया जा सकता है?
उत्तर: बृहत्संहिता नाग करण को स्थिर तथा कठोर प्रकृति के कार्यों का करण बताती है — विवाह जैसे मंगलकर्म का नहीं। हमारा पंचांग भी नाग को शुभकर्मों में वर्जनीय करणों की सूची में रखता है। इसके अतिरिक्त नाग अमावस्या के द्वितीयार्ध में आता है, और मुहूर्त चिंतामणि अमावस्या को ही मंगलकर्मों में वर्जित करता है।
प्रश्न ४: मैं स्वयं करण गणना कैसे कर सकता हूँ?
उत्तर: स्वयं करण गणना करनी हो तो प्रथम तिथि तथा तिथि की अग्रगति-डिग्री जाननी होगी। इसके लिए चंद्र एवं सूर्य का देशांतर आवश्यक है। सामान्य जनों के लिए विश्वसनीय पंचांग का प्रयोग ही सबसे सरल तथा उत्तम पद्धति है। पंचांग में प्रतिदिन का करण विस्तार से उल्लिखित रहता है।
प्रश्न ५: 11 करणों में से कौन सर्वाधिक शुभ है?
उत्तर: कार्यभेद से भिन्न। बृहत्संहिता में बव के कार्यों की सूची सर्वाधिक विस्तृत है — शुभ, चर तथा स्थिर सभी कार्य। व्यापार में वणिज, खेती तथा गृह-निर्माण में गर, मैत्री तथा आनंद के कार्यों में कौलव, दान में बालव। समस्त शुभकर्मों में वर्जनीय केवल विष्टि (भद्रा) है।
प्रश्न ६: अमावस्या के आसपास के करण अलग क्यों होते हैं?
उत्तर: चारों स्थिर करण अमावस्या के आसपास ही आते हैं — कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के द्वितीयार्ध में शकुनि, अमावस्या के दोनों अर्धों में चतुष्पाद तथा नाग, और शुक्लपक्ष की प्रतिपदा के प्रथमार्ध में किंस्तुघ्न। इन चार अर्धतिथियों में चंद्र सूर्य के सर्वाधिक निकट होता है। शेष 56 अर्धतिथियाँ सात चर करण पाला-पाली में बाँट लेते हैं। पूर्णिमा में कोई स्थिर करण नहीं है — पूर्णिमा के दोनों अर्ध विष्टि तथा बव।
प्रश्न ७: करण गणना के लिए चंद्र एवं सूर्य का देशांतर कहाँ मिलेगा?
उत्तर: करण गणना के लिए आवश्यक सूचना प्राप्त करने के कुछ विश्वसनीय स्रोत हैं — (क) सूर्य सिद्धांत जैसे प्राचीन गणित-ग्रंथ, (ख) आधुनिक ज्योतिष सॉफ्टवेयर, (ग) विश्वसनीय पंचांग। सामान्य जनों के लिए विश्वसनीय पंचांग का प्रयोग ही सबसे सरल तथा उत्तम पद्धति है।
प्रश्न ८: कौलव करण क्या है?
उत्तर: कौलव (कुलव) ग्यारह करणों में तृतीय — चर करण। बृहत्संहिता (99/4) के अनुसार इसके अधिपति मित्र हैं, तथा 99/6 कहती है कौलव में आनंद के कार्य तथा मैत्री-स्थापन शुभ हैं। मास में आठ बार आता है — प्रथम बार शुक्लपक्ष की द्वितीया के द्वितीयार्ध में।
प्रश्न ९: विष्टि करण क्या है?
उत्तर: विष्टि ही भद्रा है — सप्तम चर करण, अधिपति यम (बृहत्संहिता 99/4)। बृहत्संहिता (99/7) विष्टि में शुभकार्य का निषेध करती है, और मुहूर्त चिंतामणि (शुभाशुभ प्रकरण, श्लोक 43) इसे समस्त शुभकर्मों में वर्जनीय कहता है। मास में आठ बार आता है: शुक्लपक्ष में चतुर्थी तथा एकादशी के द्वितीयार्ध में, अष्टमी तथा पूर्णिमा के प्रथमार्ध में; कृष्णपक्ष में तृतीया तथा दशमी के द्वितीयार्ध में, सप्तमी तथा चतुर्दशी के प्रथमार्ध में।
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आज हमने जाना करण गणना की पद्धति — शास्त्रीय दृष्टिकोण में। पंचांग के पाँच अंग — वार, तिथि, नक्षत्र, योग तथा करण — के विषय में विस्तृत चर्चा समाप्त हुई। आशा है, इन धारावाहिक पोस्टों को पढ़कर आपने पंचांग की गहराई तथा ज्योतिष दर्शन की महिमा के विषय में सम्यक् जानकारी प्राप्त की है।
हस्तरेखा विचार₹1,001 से
जन्म कुंडली₹1,501 से
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