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अनंत की कहानी: कष्ट के बीच भी जिस बालक ने सुखी रहने का पथ सिखाया
✍️ Dr Prodyut Acharya | 📅 25 सितंबर 2026 | ⏱️ 7 मिनट
दुर्भाग्य का आघात नहीं, बल्कि दृष्टिकोण ही सदा के लिए मनुष्य के सुख या दुःख को निर्धारित कर देता है।
चाय की दुकान पर काम करने वाले नन्हे लड़के का नाम अनंत है। उसकी आयु बारह है। चार वर्ष पहले पिता का देहांत हो गया। एक छोटी बहन है, आयु आठ। परिवार में वे तीन हैं — माँ, बहन और अनंत। माँ लोगों के घर काम करती हैं; बहन सरकारी स्कूल में पढ़ती है, कक्षा दो में।
अनंत की पढ़ाई कक्षा दो की सीमा को ही पार नहीं कर पाई। पिता की मृत्यु के बाद विद्यालय के साथ उसकी पदयात्रा थम गई। परिवार की तीव्र कमी अकेली माँ के लिए संभालना संभव नहीं रहा। फिर भी अनंत की माँ ने प्रयास में कमी नहीं रखी — दुःख-दुर्दशा के भँवर में रहते हुए भी दो संतानों के मुख में अन्न डालने के लिए प्राणपण से लड़ती रहीं।
अनंत के पिता राजमिस्त्री थे। आय बहुत अधिक न होने पर भी परिवार किसी तरह ठीक-ठाक चलता था।
निर्मम भाग्य, अक्षत हास्य
भाग्य कितना निर्मम हो सकता है, यह अनंत जैसे बालक का जीवन देखकर ही हृदय विदीर्ण हो जाता है। फिर भी आश्चर्य की बात — अनंत के चेहरे पर दुःख की छाया नहीं, निराशा का भार नहीं। लगता है, वह भाग्य की समस्त कठोरता की उपेक्षा करके हँसी-खुशी, खेल-कूद और गुनगुनाते गीतों में काम चला लेता है उदासीन भाव से। भूल होने पर डाँट खाता है, उससे माया होती है, फिर भी क्षणभर में स्वयं को संभाल लेता है।
उसका रंग काला होने के कारण कुछ लोग हँसी में उसे 'कालू' नाम से भी पुकारते हैं। किंतु अनंत की आँखों की गहरी दृष्टि और मुख की गंभीरता में मानो एक अदृश्य उच्चारण सुनाई देता है — "भाग्य जितना भी निर्मम हो, मैं उसे जीतूँगा।"
प्रायः मैं उस चाय की दुकान पर जाता हूँ। सच कहूँ, चाय के स्वाद से अधिक अनंत के साथ परिचय ही मुझे अधिक खींचता है। उसकी बातों में एक अद्भुत गहराई होती है। सोचता हूँ, यह उसकी सचेत उपलब्धि है, या अचेतन उच्चारण? क्योंकि बारह वर्ष के बालक की जीवन की समझ ही कितनी होगी! फिर भी उसकी निर्विकार बातों के भीतर मैं बार-बार दर्शन की झलक देखता हूँ।
पक्षी और मछली का दर्शन
एक दिन मज़ाक में पूछा था —
"अरे अनंत, बुरा नहीं लगता जब तेरी उम्र के बच्चे स्कूल ड्रेस पहनकर दुकान के सामने से स्कूल जाते हैं?"
वह निर्विकार हँसी में बोला — "नहीं नहीं।"
आश्चर्यचकित होकर फिर कहा — "क्यों?"
उस दिन अनंत ने चाय की दुकान के सामने खड़े अश्वत्थ वृक्ष की ओर स्थिर दृष्टि से देखा। आँखें मानो भेदकर वृक्ष की डालियों पर बैठे पक्षियों को देख रही थीं। फिर शांत कंठ से बोला —
"वे जो पक्षी हैं, यदि वे मछलियों को देखकर सोचते — 'हम भी यदि जल में उतर पाते' — तो पक्षी भी दुःख पाते।"
कहकर हँस पड़ा वह।
उस दिन मैं चिढ़ गया था। थोड़ा क्रोध भी आया था। किंतु घर लौटकर भी बहुत देर तक उसका अद्भुत उत्तर भुला नहीं। उसका असली मर्म समझने में मेरे घंटों बीते।
पक्षी की तरह आकाश में उड़ना ही स्वाभाविक, मछली की तरह जल में तैरना ही उसका धर्म। यदि पक्षी जल के लिए विलाप करे, यदि मछली आकाश की आकांक्षा से पीड़ित हो — तो उनका जीवन अंततः केवल अभाव की वेदना में ही निमज्जित होगा।
बारह वर्ष के अनंत ने उस महान सत्य को — जिसे वेदांत कहता है "संतोष", बौद्ध दर्शन कहता है "तृष्णामुक्ति" — पक्षी और मछली की उपमा में एकदम धरती के पास उतार लाया था। और वह जानता भी नहीं था कि यह दर्शन है।
बदमाशों की शून्यता
एक दिन दुकान पर बैठे चाय पी रहा था। तभी देखा कुछ बदमाश आए हैं। चाय पीते-पीते वे गंदे शब्दों से अनंत को बींध रहे थे, यहाँ तक कि उसकी माँ पर भी कटुक्ति फेंक दी।
अनंत चुपचाप उनकी ओर देखता रहा। आँखों में एक क्षण के लिए प्रतिवाद की चमक जल उठी, फिर भी वह कुछ कह नहीं पाया। साहस शायद है, किंतु शक्ति नहीं।
मैंने विरोध किया तो वे दो-दो गालियाँ देकर चले गए। तब मैंने कहा — "कष्ट मत पाओ बेटा, ये सब बदमाश हैं।"
अनंत धीरे से सिर हिलाकर बोला — "नहीं, कष्ट नहीं लगा… बस बुरा लग रहा है, इनके लिए।"
"मतलब?"
वह शांत स्वर में बोला —
"देखा न, मुझे गंदे शब्द कहकर वे सुख पाना चाहते हैं। मतलब, उनके जीवन में वास्तव में कोई सुख नहीं है। यदि होता, तो दूसरों को कष्ट देकर आनंद खोजना न पड़ता।"
फिर हाथ का काम रोककर सरल किंतु गहरी आँखों से मेरी ओर देखा —
"उन्होंने मुझे परेशान क्यों किया? क्योंकि इसमें कथित रूप से उन्हें अच्छा लगता है। वास्तव में उनके अच्छा लगने जैसा जीवन में कोई सच्चा काम नहीं है। इसीलिए दूसरों को आघात देकर ही सुख खोजते हैं। इसीलिए मुझे बुरा लगता है — अपने लिए नहीं, इनकी शून्यता के लिए।"
उस दिन मैं और कुछ नहीं कह सका। एक बारह वर्ष का लड़का, जिसके जीवन में कष्ट के अतिरिक्त कुछ नहीं — उसने अपने अपमान को क्षणभर में दूसरे की दुर्बलता में रूपांतरित कर दिया। यह देखने की क्षमता अनेक पंडितों के भी नहीं है।
गाने वाला बूढ़ा बड़े आदमी के यहाँ खाता है, वैद्य बूढ़ा दो-मंजिले पर जाता है
इसी प्रकार अनंत का शैशव बीत रहा था। देखते-देखते दो और वर्ष। बहन अब कक्षा चार में है, अगले वर्ष हाईस्कूल में जाएगी। अनंत को अधिक कमाई की आवश्यकता है।
उस संध्या मैंने पूछा — "यहाँ से काम छोड़ने पर अब कहाँ जाएगा?"
"जीवन जहाँ ले जाएगा।"
क्रोध से सिर गर्म हो उठा। वह कभी सीधे कुछ नहीं कहता। "कहीं काम-धंधा तय किया है क्या?"
"नहीं। अभी कुछ तय नहीं हुआ। किंतु कुछ एक तो करना ही होगा जिससे आय थोड़ी बढ़े।"
"क्या करने जाएगा?"
अनंत अद्भुत हँसी में बोला — "गाने वाला बूढ़ा बड़े आदमी के यहाँ खाता है, वैद्य बूढ़ा दो-मंजिले पर जाता है।"
"स्पष्ट करके नहीं कह सकता?"
शांत धैर्य से वह बोला —
"जो संगीत साधना करते हैं, वे एक दिन नाम-प्रतिष्ठा पाते हैं। किंतु वह नाम केवल गला अच्छा रहने तक ही रहता है। गला बिगड़ने पर हाथ फैलाना पड़ता है दूसरों के सामने। हमारे मोहल्ले के उस दादा को याद है न — सुना था कभी नामी कलाकार थे, आज उनकी स्थिति क्या है। इसके विपरीत पास के गाँव के वैद्य दादा — लाठी के बिना चल नहीं सकते। फिर भी रोगी की आवश्यकता पर एक दिन पालकी से उन्हें ले गए लोग। मर्यादा आज भी अक्षुण्ण है। इसीलिए मैंने सोचा — ऐसा कुछ सीखना है, जो बुढ़ापे में भी मर्यादा कम न होने दे।"
बालक के कंठ में यह बात सुनकर दिनभर की सारी थकान क्षणभर में कहीं मिल गई।
विदाई के बाद जो रह गया
इसके बाद अनंत को फिर नहीं देखा। काम छोड़ने के बाद मात्र दो दिन उस दुकान पर गया था। किंतु अनंत के बिना वहाँ मन नहीं टिका।
दो वर्ष के उस संबंध में मैंने उसे बहुत कुछ दिया — शायद कुछ परामर्श, कुछ प्रोत्साहन। किंतु हिसाब मिलाने पर देखता हूँ, पाने का पलड़ा मेरा ही भारी है।
अनंत ने मुझे सिखाया — दुर्भाग्य जीवन के प्रवाह को रोक नहीं सकता। वह मानो किसी शिकायत के बिना स्वीकार कर चुका था — जीवन ऐसा ही है, और उसे चलते ही रहना है।
ग्रीक पौराणिक कथा में सिसिफस प्रतिदिन पहाड़ के ऊपर पत्थर धकेलकर ले जाता है। पत्थर लुढ़ककर गिर जाता है। वह फिर उठाता है। कोई प्रतिवाद नहीं, कोई शिकायत नहीं। दार्शनिक अल्बेयर कामू ने लिखा था — "सिसिफस को सुखी मानना चाहिए।" क्योंकि संघर्ष ही उसके अस्तित्व का अर्थ है।
अनंत भी वैसा ही। वह कामू को नहीं जानता था, सिसिफस को नहीं जानता था। किंतु प्रतिदिन वह वही पत्थर उठाता — बिना किसी भूमिका के, बिना किसी दर्शन के ठप्पे के।
जीवन के सर्वोत्तम पाठ पुस्तकों से नहीं आते। कभी-कभी वे आते हैं एक चाय की दुकान से — बारह वर्ष के एक लड़के के कंठ में, जिसका नाम अनंत है।
"दुर्भाग्य का आघात नहीं, बल्कि दृष्टिकोण ही सदा के लिए मनुष्य के सुख या दुःख को निर्धारित कर देता है।"
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✍️ लेखक परिचय
Dr Prodyut Acharya
ज्योतिषी, हस्तरेखाविद, दार्शनिक विचारक और भाग्य उन्नति परामर्शदाता। रानाघाट, नदिया, पश्चिम बंगाल। myastrology.in
हस्तरेखा विचार₹1,001 से
जन्म कुंडली₹1,501 से
विवाह मिलान₹2,001 से
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