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पंचांग के पन्नों पर तिथि, वार, नक्षत्र, करण के साथ-साथ एक और महत्वपूर्ण अंग होता है — योग। तिथि-नक्षत्र की तरह यह उतना परिचित नहीं है, परंतु ज्योतिष दर्शन में योग का महत्व अपार है। क्योंकि योग है सूर्य और चंद्र के देशांतर का योगफल — यह समय के उस विशेष क्षण को दर्शाता है जो कर्म की स्थिति तथा अंतिम परिणाम पर प्रभाव डालता है। प्राचीन ऋषियों ने खोजा था कि सूर्य और चंद्र — इन दो ज्योतिष्कों के मिलन से ही समय का गहनतम रहस्य बनता है। उस रहस्य का नाम ही योग है।
यदि आप जन्म कुंडली (natal chart) अथवा Kundli making के माध्यम से होरोस्कोप (horoscope) विश्लेषण करते हैं, तो योग की सही गणना अत्यंत आवश्यक है। शास्त्र कहता है, निर्दिष्ट योग में आरंभ किया गया कार्य निर्दिष्ट परिणाम की संभावना उत्पन्न करता है। जैसे — 'विष्कुम्भ' योग में आरंभ करने पर कार्य में बाधा आने की आशंका रहती है, और 'शुभ' योग में आरंभ करने पर सफलता प्राप्त होने की संभावना बढ़ जाती है। विवाह, गृहप्रवेश, व्यापार आरंभ — प्रायः सभी शुभकर्मों के मुहूर्त निर्णय में योग की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है।
आज हम जानेंगे योग वास्तव में क्या है, इसकी गणना कैसे होती है, २७ योगों के नाम और स्वभाव, तथा ज्योतिषशास्त्र में योग का महत्व — सब कुछ सरल हिंदी में, ज्योतिष दर्शन की भाषा में।
📌 महत्वपूर्ण सूचना: कुछ सरलीकृत पद्धतियों में योग गणना के लिए १२° का प्रयोग किया जाता है, परंतु शास्त्रीय रूप से सही विभाजन १३°२०′ (८०० आर्कमिनट) है। इस पोस्ट में हम शास्त्रसम्मत पद्धति का अनुसरण कर रहे हैं।
योग क्या है? ज्योतिष दर्शन की परिभाषा
योग सूर्य और चंद्र के देशांतर के योगफल को १३°२०′ (अर्थात् ८०० आर्कमिनट) से भाग देकर प्राप्त भागफल के पूर्णांक भाग के अनुसार निर्धारित विशेष क्षण है।सूर्य और चंद्र के देशांतर के योगफल से योग की सृष्टि होती है, और योग कुल २७ होते हैं।
मुहूर्त-विचार में योग बताता है, किसी निर्दिष्ट समय पर आरंभ किया गया कर्म कैसा फलप्रद होगा — सफल होगा अथवा बाधित होगा, स्थिर रहेगा अथवा परिवर्तित होगा। योग कर्म की अंतिम परिणति के विषय में जानकारी देता है।
२७ योगों की सम्पूर्ण सूची एवं स्वभाव
सूर्य और चंद्र के देशांतर के योगफल को १३°२०′ (८०० आर्कमिनट) से भाग देने पर २७ भाग प्राप्त होते हैं। प्रत्येक भाग का एक नाम तथा विशेष स्वभाव है।
| क्रम | योग का नाम | अंश परिसर | स्वभाव | प्रभाव एवं उपयोग की संभावना |
|---|---|---|---|---|
| १ | विष्कुम्भ | ०°–१३°२०′ | अशुभ | आरंभ किए गए कार्य में बाधा आने की आशंका। शुभकर्म के लिए टालना उत्तम। |
| २ | प्रीति | १३°२०′–२६°४०′ | शुभ | प्रेम, सौहार्द, मैत्री की संभावना। विवाह, संबंध, सामाजिक कार्यों के लिए अनुकूल। |
| ३ | आयुष्मान | २६°४०′–४०°००′ | शुभ | दीर्घायु, स्वास्थ्य, सुस्थता की संभावना। चिकित्सा आरंभ, स्वास्थ्यकर्म के लिए अनुकूल। |
| ४ | सौभाग्य | ४०°००′–५३°२०′ | शुभ | सौभाग्य, समृद्धि, भाग्य की उन्नति की संभावना। व्यापार, निवेश, संपत्ति क्रय के लिए अनुकूल। |
| ५ | शोभन | ५३°२०′–६६°४०′ | शुभ | सौंदर्य, शोभा, आकर्षण की संभावना। शिल्पकला, आभूषण क्रय, विवाह के लिए अनुकूल। |
| ६ | अतिगण्ड | ६६°४०′–८०°००′ | अशुभ | संकट, दुर्घटना, अकल्याण की आशंका। यात्रा, नवकार्य आरंभ में सावधानी आवश्यक। |
| ७ | सुकर्मा | ८०°००′–९३°२०′ | शुभ | सत्कर्म, पुण्य, धार्मिक फल की संभावना। दान-ध्यान, पूजा-पाठ के लिए अनुकूल। |
| ८ | धृति | ९३°२०′–१०६°४०′ | शुभ | धैर्य, स्थिति, सहिष्णुता की संभावना। दीर्घकालिक परियोजना, शिक्षा, अनुसंधान के लिए अनुकूल। |
| ९ | शूल | १०६°४०′–१२०°००′ | अशुभ | शूल जैसी तीव्र वेदना, कष्ट, यंत्रणा की आशंका। शुभकर्म के लिए टालना उत्तम। |
| १० | गण्ड | १२०°००′–१३३°२०′ | अशुभ | संकट, विपत्ति, अशांति की आशंका। विवाह, गृहप्रवेश के लिए अनुपयुक्त। |
| ११ | वृद्धि | १३३°२०′–१४६°४०′ | शुभ | उन्नति, वृद्धि, सफलता की संभावना। व्यापार, शिक्षा, निवेश के लिए अनुकूल। |
| १२ | ध्रुव | १४६°४०′–१६०°००′ | शुभ | स्थिरता, दीर्घस्थायी फल। स्थावर संपत्ति क्रय, गृहप्रवेश के लिए अनुकूल। |
| १३ | व्याघात | १६०°००′–१७३°२०′ | अशुभ | बाधा, विघ्न, प्रतिबंध की आशंका। नवकार्य आरंभ में सावधानी आवश्यक। |
| १४ | हर्षण | १७३°२०′–१८६°४०′ | शुभ | आनंद, उत्सव, सफलता की संभावना। विवाह, सामाजिक समारोह के लिए अनुकूल। |
| १५ | वज्र | १८६°४०′–२००°००′ | अशुभ | विनाश, दुर्घटना, संकट की आशंका। युद्ध, प्रतिस्पर्धा के लिए अनुकूल नहीं। |
| १६ | सिद्धि (असृक) | २००°००′–२१३°२०′ | शुभ | सफलता, सिद्धि, मनोकामना पूर्ति की संभावना। किसी भी शुभकर्म के लिए अत्यंत अनुकूल। |
| १७ | व्यतीपात | २१३°२०′–२२६°४०′ | अशुभ | अशांति, दुर्भोग, विपर्यय की आशंका। शुभकर्म के लिए एकदम अनुपयुक्त। |
| १८ | वरियान | २२६°४०′–२४०°००′ | शुभ | श्रेष्ठत्व, उत्कर्ष, उन्नति की संभावना। राजकीय कार्य, नेतृत्व के लिए अनुकूल। |
| १९ | परिघ | २४०°००′–२५३°२०′ | अशुभ | बाधा, प्रतिबंध, शत्रुता की आशंका। नवकार्य आरंभ में सावधानी आवश्यक। |
| २० | शिव | २५३°२०′–२६६°४०′ | शुभ | मंगल, शांति, कल्याण की संभावना। धार्मिक कार्य, दान-ध्यान के लिए अनुकूल। |
| २१ | सिद्ध | २६६°४०′–२८०°००′ | शुभ | सफलता, सिद्धि, पूर्णता की संभावना। किसी भी शुभकर्म के लिए अत्यंत अनुकूल। |
| २२ | साध्य | २८०°००′–२९३°२०′ | शुभ | साधना, अर्जन, परिश्रम के फलप्राप्ति की संभावना। शिक्षा, नौकरी, कार्यक्षेत्र में अनुकूल। |
| २३ | शुभ | २९३°२०′–३०६°४०′ | शुभ | अत्यंत शुभ, मंगलमय। विवाह, गृहप्रवेश, व्यापार आरंभ — सभी शुभकर्मों के लिए उत्तम। |
| २४ | शुक्ल (शुक्र) | ३०६°४०′–३२०°००′ | शुभ | पवित्रता, उज्ज्वलता, सौभाग्य की संभावना। धार्मिक अनुष्ठान, व्रत-उपवास के लिए अनुकूल। |
| २५ | ब्रह्म | ३२०°००′–३३३°२०′ | शुभ | सृजनशीलता, ज्ञान, बुद्धि की संभावना। शिक्षा, अनुसंधान, शिल्पकला के लिए अनुकूल। |
| २६ | इंद्र | ३३३°२०′–३४६°४०′ | शुभ | ऐश्वर्य, गौरव, प्रतिष्ठा की संभावना। राजकीय कार्य, सामाजिक मर्यादा वृद्धि के लिए अनुकूल। |
| २७ | वैधृति | ३४६°४०′–३६०°००′ | अशुभ | वैधता ह्रास, अमंगल, बाधा की आशंका। विवाह, गृहप्रवेश के लिए एकदम अनुपयुक्त। |
योग गणना की शास्त्रीय पद्धति
मूल सूत्र
सूर्य सिद्धांत (स्पष्टाधिकार) ने योग गणना का नियम दिया है — सूर्य और चंद्र के देशांतर के योगफल को नक्षत्र के माप (८०० कला) से भाग देना।योग क्रम संख्या = ⌊(सूर्य देशांतर + चंद्र देशांतर) ÷ १३°२०′⌋ + १
१३°२०′ = १३×६० + २० = ८०० आर्कमिनट
यहाँ ⌊ ⌋ चिह्न फ्लोर फंक्शन को दर्शाता है — अर्थात् भागफल के पूर्णांक भाग को लेना है, दशमलव भाग को छोड़ देना है। शेषफल नहीं, भागफल के पूर्णांक भाग से योग निर्णय किया जाता है।
⚠️ महत्वपूर्ण सावधानी:
कुछ पंचांग अथवा वेबसाइट पर शेषफल से योग निर्णय की गलत पद्धति दिखाई जाती है। शास्त्रीय नियम है — भागफल के पूर्णांक (फ्लोर) से योग निर्णय करना। शेषफल से निर्णय करने पर योग गलत होता है। जैसे: योगफल २७०° को १३°२०′ से भाग देने पर भागफल २०.२५। यहाँ भागफल के पूर्णांक २० का प्रयोग करके योग संख्या २१ प्राप्त होती है। शेषफल ०.२५ का प्रयोग करने पर भिन्न योग प्राप्त होगा, जो शास्त्रसम्मत नहीं।
चरण-दर-चरण गणना
चरण १: सूर्य का देशांतर तथा चंद्र का देशांतर निकालें (०° से ३६०° तक)।
चरण २: दोनों का योगफल निकालें। योगफल ३६०° से अधिक हो तो ३६०° घटाएँ।
चरण ३: योगफल को १३°२०′ (अर्थात् १३.३३३ अंश या ८०० आर्कमिनट) से भाग दें।
चरण ४: भागफल का पूर्णांक भाग (फ्लोर) लें — अर्थात् दशमलव के बाद की संख्याएँ छोड़ दें।
चरण ५: प्राप्त संख्या में १ जोड़ें। प्राप्त संख्या योग की क्रम संख्या (१ से २७ तक) है।
चरण ६: ऊपर की सूची से उस क्रम संख्या का योग चिह्नित करें।
उदाहरण १: सामान्य गणना
मान लें, सूर्य का देशांतर ७०° और चंद्र का देशांतर २००° —
- योगफल = ७०° + २००° = २७०°
- २७० ÷ १३.३३३ = २०.२५
- पूर्णांक भाग (फ्लोर) = २०
- २० + १ = २१
- क्रम संख्या २१ = सिद्ध योग
उदाहरण २: योगफल ३६०° अतिक्रमण करने पर
मान लें, सूर्य का देशांतर ३५०° और चंद्र का देशांतर ३०° —
- योगफल = ३५०° + ३०° = ३८०°
- ३८०° – ३६०° = २०° (एक बार चक्र पूर्ण)
- २० ÷ १३.३३३ = १.५
- पूर्णांक भाग (फ्लोर) = १
- १ + १ = २
- क्रम संख्या २ = प्रीति योग
उदाहरण ३: सीमा क्षेत्र (boundary case) — महत्वपूर्ण
मान लें, योगफल ठीक १३°२०′ (अर्थात् ८०० आर्कमिनट) —
- १३°२०′ ÷ १३°२०′ = १
- पूर्णांक भाग (फ्लोर) = १
- १ + १ = २
- क्रम संख्या २ = प्रीति योग
📌 सीमा नियम: जब भागफल पूर्ण संख्या हो (अर्थात् योगफल ठीक १३°२०′, २६°४०′ इत्यादि), तब अगला योग आरंभ होता है। अर्थात् सीमा बिंदु पर नया योग गण्य होता है। १३°२०′ बिंदु विष्कुम्भ योग के अंतर्गत नहीं, यह प्रीति योग का आरंभ है।
दिन का योग और वर्तमान योग: एक महत्वपूर्ण अंतर
पंचांग में दो प्रकार के योग का उल्लेख रहता है — दिन का योग और वर्तमान योग। इनके बीच का अंतर समझना आवश्यक है।
दिन का योग (Daily Yoga)
सूर्योदय के समय जो योग रहता है, उसे 'दिन का योग' कहा जाता है। पंचांग के पन्ने पर सामान्यतः यह योग उल्लिखित रहता है। यह सम्पूर्ण दिन के लिए एक संदर्भ बिंदु है।
वर्तमान योग (Running Yoga)
योग दिन के भीतर परिवर्तित होता है। निर्दिष्ट समय पर जो योग चल रहा है, वह 'वर्तमान योग' है। शुभ मुहूर्त निर्णय के समय वर्तमान योग विचारणीय होता है।
📖 उदाहरण: मान लें, १५ जनवरी को सूर्योदय के समय शुभ योग चल रहा है। यह दिन का योग होगा। परंतु प्रातः १० बजे योग परिवर्तित होकर सिद्धि योग आरंभ हो गया। तब किसी शुभकर्म में वर्तमान योग (सिद्धि) विचारणीय होगा, दिन का योग (शुभ) नहीं। पंचांग में प्रत्येक योग का आरंभ तथा अंत समय उल्लिखित रहता है — उसे देखकर वर्तमान योग निकाला जाता है।
योग का व्यावहारिक प्रयोग
१. शुभकर्म में योग की भूमिका
ज्योतिषशास्त्र में योग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। निर्दिष्ट योग में निर्दिष्ट कार्य करने पर अनुकूल परिणाम की संभावना उत्पन्न होती है। परंतु यह एकमात्र अंतिम निर्णय नहीं — ग्रहों की स्थिति, तिथि, नक्षत्र, लग्न, करण — सब मिलाकर शुभ मुहूर्त निर्णय किया जाता है। जन्म कुंडली (natal chart) अथवा Kundli making के समय यही समन्वय एक ज्योतिषी को सही मुहूर्त निर्धारण में सहायता करता है।
२. अशुभ योग: वैधृति एवं व्यतीपात
मुहूर्त चिंतामणि (शुभाशुभ प्रकरण) शुभकर्म में जिन योगों को सदैव वर्जित करने को कहता है, उनमें हैं व्यतीपात एवं वैधृति — सम्पूर्ण योगकाल — तथा विष्कुम्भ एवं वज्र योग का प्रथम कुछ घटी। इसलिए विवाह, गृहप्रवेश, व्यापार आरंभ जैसे कार्यों में व्यतीपात एवं वैधृति पूर्णतः टाले जाते हैं।३. शुभ योग: शुभ एवं सिद्धि
शुभ योग तथा सिद्धि योग अत्यंत शुभ स्वभाव के हैं। विवाह, गृहप्रवेश, व्यापार आरंभ — किसी भी शुभकर्म के लिए ये योग अत्यंत अनुकूल हैं। शुभ योग में सामान्यतः सभी प्रकार के शुभकर्म अनुकूल होते हैं। सिद्धि योग में मनोकामना पूर्ति तथा सफलता प्राप्ति की संभावना अधिक रहती है।योग का दार्शनिक दृष्टिकोण
पंचांग के पाँच अंगों को पंचभूत से मिलाने वाले आधुनिक लेखकों की व्याख्या — लेखकभेद से योग को कोई पृथ्वी, कोई आकाशतत्त्व से मिलाता है। मुहूर्त-विचार में योग का कार्य बताना है, किसी निर्दिष्ट समय पर आरंभ किया गया कर्म कैसा फलप्रद होगा। यह कर्म की अंतिम परिणति के विषय में जानकारी देता है।
मुहूर्त-विचार में योग फल दर्शाता है — स्थिति अथवा परिवर्तन, सफलता अथवा बाधा। योग के माध्यम से हम जान सकते हैं, किसी निर्दिष्ट क्षण पर आरंभ किए गए कर्म का स्वभाव क्या होगा — स्थिर अथवा चंचल, सफल अथवा विघ्नित।
योग गणना के लिए आवश्यक सूचना
योग गणना के लिए निम्नलिखित सूचना आवश्यक है —
१. सूर्य एवं चंद्र का देशांतर योग गणना के लिए सूर्य एवं चंद्र का देशांतर आवश्यक है। यह सूचना प्राप्त होती है —
- सूर्य सिद्धांत जैसे गणित-ग्रंथ से
- आधुनिक ज्योतिष सॉफ्टवेयर से
- विश्वसनीय पंचांग से
२. सूर्योदय का समय योग गणना के लिए स्थानीय सूर्योदय का समय जानना आवश्यक है।
उपसंहार: योग — कर्म के फल का निर्देशक
योग गणना की पद्धति केवल एक ज्योतिर्वैज्ञानिक गणना नहीं है। यह प्राचीन भारतीय ज्योतिष दर्शन का एक अपूर्व दृष्टांत है — जहाँ सूर्य और चंद्र के मिलन के माध्यम से कर्म के परिणाम की संभावना के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। शुभ योग में आरंभ करने पर सफलता की संभावना बढ़ जाती है, अशुभ योग में बाधा आने की आशंका रहती है — यह सूक्ष्म पर्यवेक्षण प्राचीन ऋषियों के असामान्य ज्ञान का परिचय देता है।
"योग जाने तो कर्म की संभावना जाने,
शुभ में करो शुभकर्म, अशुभ में रहो सावधान।।"
❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न १: शुभ योग और सिद्धि योग — इन दोनों में कौन अधिक शुभ है?
उत्तर: दोनों शुभ श्रेणी के योग हैं, और पंचांग दोनों को शुभकर्म के उपयुक्त मानता है। कौन अधिक शुभ, इस विषय में कोई सार्वभौमिक क्रम नहीं — शुभ समय तिथि, नक्षत्र, करण तथा लग्न के साथ मिलाकर तय होता है।
प्रश्न २: वैधृति योग क्यों टाला जाता है? क्या यह सदैव अशुभ है?
उत्तर: मुहूर्त चिंतामणि शुभकर्म में व्यतीपात तथा वैधृति — दोनों योगों को सम्पूर्ण समय के लिए वर्जित करने को कहता है, अन्य अशुभ योगों की तरह कुछ घटी नहीं। इसलिए विवाह, गृहप्रवेश, व्यापार आरंभ जैसे नवकार्य वैधृति में आरंभ नहीं किए जाते। यह नियम कार्य के आरंभ समय के लिए है — पहले से चल रहे कार्यों पर लागू नहीं होता।
प्रश्न ३: योग गणना के लिए १२° अथवा १३°२०′ का प्रयोग करें?
उत्तर: शास्त्रीय रूप से सही विभाजन १३°२०′ (८०० आर्कमिनट) है। कुछ सरलीकृत पंचांगों में सुविधा के लिए १२° का प्रयोग किया जाता है, परंतु यह शास्त्रसम्मत नहीं। इस पोस्ट में हमने शास्त्रीय पद्धति का अनुसरण किया है। सटीक पंचांग निर्माण के लिए १३°२०′ का प्रयोग ही उत्तम है।
प्रश्न ४: भागफल तथा शेषफल — किससे योग निर्णय सही है?
उत्तर: शास्त्रीय नियम है भागफल के पूर्णांक (फ्लोर) से योग निर्णय करना। शेषफल से निर्णय करने पर योग गलत होता है। कुछ पंचांगों में शेषफल पद्धति दिखाई देती है, परंतु यह शास्त्रसम्मत नहीं। इस पोस्ट के 'योग गणना की शास्त्रीय पद्धति' भाग में विस्तार से व्याख्या दी गई है।
प्रश्न ५: २७ योगों में कितने शुभ तथा कितने अशुभ हैं?
उत्तर: २७ योगों में १८ शुभ स्वभाव के तथा ९ अशुभ स्वभाव के हैं। शुभ योग हैं — प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य, शोभन, सुकर्मा, धृति, वृद्धि, ध्रुव, हर्षण, सिद्धि, वरियान, शिव, सिद्ध, साध्य, शुभ, शुक्ल, ब्रह्म, इंद्र। अशुभ योग हैं — विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यतीपात, परिघ, वैधृति।
प्रश्न ६: 'दिन का योग' तथा 'वर्तमान योग' — इनके बीच का अंतर क्या है?
उत्तर: सूर्योदय के समय जो योग रहता है, उसे 'दिन का योग' कहा जाता है। यह पंचांग के पन्ने पर उल्लिखित रहता है। परंतु योग दिन के भीतर परिवर्तित होता है। निर्दिष्ट समय पर जो योग चल रहा है, वह 'वर्तमान योग' है। शुभ मुहूर्त निर्णय के समय वर्तमान योग विचारणीय होता है। पंचांग में प्रत्येक योग का आरंभ तथा अंत समय दिया रहता है।
प्रश्न ७: योग गणना के लिए सूर्य एवं चंद्र का देशांतर कहाँ मिलेगा?
उत्तर: योग गणना के लिए आवश्यक सूचना प्राप्त करने के कुछ विश्वसनीय स्रोत हैं — (क) सूर्य सिद्धांत जैसे प्राचीन गणित-ग्रंथ, (ख) आधुनिक ज्योतिष सॉफ्टवेयर, (ग) विश्वसनीय पंचांग। सामान्य मनुष्यों के लिए विश्वसनीय पंचांग का प्रयोग ही सबसे सरल तथा उत्तम पद्धति है।
📖 पंचांग सीरीज़ का समापन
आज हमने जाना योग गणना की पद्धति — शास्त्रीय दृष्टिकोण में। पंचांग के पाँच अंग — वार, तिथि, नक्षत्र, योग तथा करण — इनमें से प्रत्येक का अपना महत्व है। जन्म कुंडली (natal chart) अथवा Kundli making के समय इस पंचांग का समन्वय ही सही परिणाम देता है। होरोस्कोप (horoscope) विश्लेषण में योग की भूमिका अपार है।
हस्तरेखा विचार₹1,001 से
जन्म कुंडली₹1,501 से
विवाह मिलान₹2,001 से
रत्नपरामर्श
वास्तु शास्त्रपरामर्श
अंक ज्योतिषपरामर्श
प्रश्न ज्योतिषपरामर्श
राशिफलरोज़, निःशुल्क
पंचांगबंगाली तिथि