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बार-बार असफल होने पर भी जीवन रुकता नहीं — प्रदीप की कहानी
✍️ Dr Prodyut Acharya | 📅 25 सितंबर 2026 | ⏱️ 9 मिनट
"दुर्भाग्य का आघात नहीं, बल्कि दृष्टिकोण ही मनुष्य के मानसिक सुख या दुःख को निर्धारित कर देता है।"
क्या तुमने कभी ऐसे किसी को देखा है — जिसके पास परिवार है, व्यापार है, संतान है — फिर भी उसकी आँखों में एक अदृश्य शून्यता है? बाहर से देखने पर लगता है इस व्यक्ति को किसकी कमी है, किंतु पास जाने पर समझ में आता है भीतर कहीं एक घाव सूखा नहीं। प्रदीप ठीक ऐसा ही एक व्यक्ति है। उसकी कहानी पढ़ते-पढ़ते शायद तुम अपने जीवन का कोई एक अध्याय खोज लो — क्योंकि यह यंत्रणा केवल उसकी नहीं, यह यंत्रणा हमारी पीढ़ी की है।
नौकरी न मिलना, प्रियजन को खोना, स्वयं को अयोग्य मानना — ये भावनाएँ लाखों बंगाली युवकों की परिचित हैं। किंतु क्यों कोई कष्ट के बीच भी शांत रहता है, और कोई सुख के बीच भी अशांत? इस प्रश्न का उत्तर छिपा है प्रदीप और अनंत — दो युवकों के दो जीवन की कहानी में।
प्रदीप — जिसके पास सब है, फिर भी कुछ नहीं
गाँव का लड़का प्रदीप, आयु अब उसकी तीस। अपनी स्टील फर्नीचर की फैक्ट्री है, जहाँ बाईस-पच्चीस कर्मचारी प्रतिदिन काम करते हैं। आसपास अधिक प्रतिस्पर्धा न होने के कारण व्यापार दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। दो वर्ष पहले विवाह किया, अब एक पुत्र का पिता भी है। विवाह के समय ससुराल से बहुत कुछ देने का प्रस्ताव आया था — प्रदीप ने वे सब नहीं लिए। आत्ममर्यादा उसके स्वभाव का अंग है।
प्रदीप के पिता वन विभाग के सरकारी अधिकारी थे। सुखी परिवार में पले-बढ़े, ग्रेजुएशन पूरा करने वाले प्रदीप ने बार-बार नौकरी के प्रयास में कदम रखा। बार-बार असफल हुआ। उस कठिन समय में मेरा उससे परिचय हुआ, फिर मित्रता। तब से वह मुझे बहुत सम्मान देता है।
आज वह स्थापित है। आर्थिक रूप से निश्चिंत। किंतु मेरे साथ बात करते-करते कई बार देखा है — आँखों का जल वह छिपा नहीं पाया।
उस संध्या की बात
एक संध्या प्रदीप अचानक आकर बैठा। फैक्ट्री का काम समाप्त करके आया था, हाथों पर अब भी तेल के दाग थे। कुछ क्षण चुप रहकर बोला —
"दादा, क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि कुछ पाकर भी पाया नहीं गया?"
मैं आश्चर्यचकित हुआ। कहा — "मतलब?"
खिड़की के बाहर देखते हुए वह बोला — "जब नौकरी नहीं मिली, सोचा व्यापार करने से शायद मन ठीक हो जाएगा। व्यापार अब अच्छा चल रहा है। किंतु मन..."
शेष वह और नहीं बोला।
कॉलेज जीवन में एक लड़की के साथ उसका गहरा संबंध था। चार वर्ष का वह प्रेम टूट गया केवल इस कारण से कि प्रदीप को नौकरी नहीं मिली। लड़की के परिवार ने उसे स्वीकार नहीं किया, विवाह कर दिया एक सरकारी अधिकारी के साथ। नौकरी न मिलने का दर्द और प्रियजन को खोने का कष्ट — दोनों मिलकर एकाकार हो गए थे।
उसके बाद उसने जितना पाया, उतना ही वह न-पाने का घाव और ताजा होता गया। क्योंकि प्रत्येक प्राप्ति उसे याद दिलाती है — "यह पाया, किंतु वह नहीं पाया।"
दूर से सब कुछ सामान्य, निर्दोष लगता है, फिर भी प्रदीप के मन की गहराई में एक प्रकार की अस्थिरता संघनित हो चुकी है — ठीक वैसे ही जैसे शांत जल के नीचे धारा बहती रहती है।
अनंत — जिसके पास कुछ नहीं, फिर भी शांति है
तब याद आती है अनंत की।
बारह वर्ष का वह लड़का — पिता को खो दिया, पढ़ाई बंद हो गई, चाय की दुकान पर काम करना पड़ रहा है। अनंत के जीवन में जो खोया, उसका भार प्रदीप से बहुत अधिक है। फिर भी अनंत की आँखों में वह भार कभी नहीं देखा। जीवन के प्रति कोई शिकायत नहीं, कोई हाहाकार नहीं। वह जो पाया उसी के साथ चलता है — निर्विकार भाव से, स्वाभाविक रूप से।
और प्रदीप — जिसके घर में परिवार है, व्यापार है, संतान है — वह प्रतिदिन एक न-पाने को वक्ष के मध्य में पकड़कर जागता है।
दोनों के बीच का अंतर परिस्थिति में नहीं। अंतर देखने की आँखों में है।
अनंत ने जो है उसी से जीवन बनाया। प्रदीप ने जो नहीं है उसी से जीवन मापा।
दार्शनिक व्याख्या — इस अंतर का कारण क्या है?
इसका उत्तर निहित है मनुष्य के अंतर्निहित दर्शन में — जीवन के प्रति दृष्टिकोण में।
अनंत ने चुना था स्वीकृति और ग्रहण का पथ। जो उसने खोया या नहीं पाया उसके लिए हाहाकार न करके, अपने अस्तित्व की वास्तविकता को ही मानकर संतुष्ट होने का प्रयास किया। यह ग्रहण ही उसे दिया एक प्रकार की स्वाभाविक शांति।
दूसरी ओर प्रदीप ने चुना है तुलना और आकांक्षा का पथ। उसकी आँखें सदा उस अप्राप्ति पर टिकी हैं — नौकरी न मिलना, प्रियजन को खोना। इसीलिए जीवन की प्राप्तियाँ और सफलताएँ उसके लिए अर्थहीन हो जाती हैं।
बौद्ध दर्शन में इस मानसिक अवस्था का एक नाम है — "तृष्णा"। जो है उसका स्वाद लेने नहीं देती, जो नहीं है उसकी ओर मन खींचे रखती है।
ज्योतिषशास्त्र में इसे कहते हैं राहु का प्रभाव — राहु कभी तृप्त नहीं होता, सदा और चाहता है, जो पाया वह याद नहीं रहता। प्रदीप के जीवन में राहु ठीक इसी प्रकार काम कर रहा है। कुंडली में राहु की स्थिति समझने पर इस अतृप्ति की जड़ें खोजना संभव है — और उसी के अनुसार उपाय भी।
मार्कस ऑरेलियस ने अपनी डायरी में लिखा था, अपने लिए ही —
"जीवन में जो हमें कष्ट देता है, वह वास्तव में घटनाएँ नहीं, उन घटनाओं के बारे में हमारी धारणाएँ हैं।"
प्रदीप जीवन में असफल नहीं हुआ — वह अपनी धारणा में असफल हुआ। नौकरी न मिलना केवल एक घटना थी। किंतु उसने उस घटना को आजीवन की एक कहानी बना दिया — "मैं अयोग्य हूँ।"
जो मैं कह नहीं पाया
उस संध्या प्रदीप के चले जाने के बाद बहुत देर तक बैठा रहा।
सोचा — उसे क्या कहूँ? कहूँ कि जो तुमने खोया वह तुम्हारी नियति थी, और जो पाया वह भी तुम्हारी नियति का ही अंग है? कहूँ कि वह लड़की जो नौकरी न होने पर हट गई, वह वास्तव में तुम्हारे लिए नहीं थी?
नहीं कहा। क्योंकि ये बातें बुद्धि से समझी जाती हैं, वक्ष में धारण करने में समय लगता है।
प्रदीप के पास एक ही काम शेष है — जो कहानी वह अपने बारे में कहता चल रहा है, वह कहानी बदलना। क्योंकि ज्योतिष कहता है — ग्रह परिस्थिति बनाते हैं, किंतु उस परिस्थिति का अर्थ हम स्वयं निर्मित करते हैं। उस अर्थ को बदल देने की शक्ति भी हमारी ही है।
वह जिस मिट्टी पर फर्नीचर गढ़ता है, उसी मिट्टी पर उसने अपना भविष्य गढ़ा है। यह स्वीकृति भर ही उसकी मुक्ति का पहला कदम हो सकती है।
"ग्रहण ही प्रशांति लाता है, और तुलना ही वेदना को जन्म देती है।"
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✍️ लेखक परिचय
Dr Prodyut Acharya
ज्योतिषी, हस्तरेखाविद, दार्शनिक विचारक और भाग्य उन्नति परामर्शदाता। रानाघाट, नदिया, पश्चिम बंगाल। myastrology.in
हस्तरेखा विचार₹1,001 से
जन्म कुंडली₹1,501 से
विवाह मिलान₹2,001 से
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